ramnik muni ji pravachan
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बेंगलूरु/दक्षिण भारत। वर्द्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ चिकपेट शाखा के तत्वावधान में यहां गोड़वाड़ भवन में उपाध्यायश्री रवींद्रमुनिजी ने बुधवार को मंगलाचरण से धर्मसभा की शुरुआत की। इस अवसर पर सलाहकारश्री रमणीकमुनिजी ने सत्य पथ पर चलने, प्रभु नाम को जपने की सीख देते हुए कहा कि जिसकी जिंदगी का जीने का तरीका, सोच का तरीका बदल जाता है उसके जीवन में बदलाव सकारात्मक ही होगा।

उन्होंने कहा, धर्म और अधर्म में एक ही बात स्पष्ट है कि व्यक्ति के जीवन में जितना भी सकारात्मक बदलाव आता है वही धर्म है तथा नकारात्मक बदलाव पाप है। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर की भाषा में सकारात्मक बदलाव को सम्यक्त्व तथा नकारात्मक परिवर्तन को मिथ्यात्व कहा गया है।

उन्होंने कहा, जो है नहीं, उसे मान लेना ही नकारात्मकता है। मुनिश्री ने कहा, जितने भी चातुर्मास आयोजन होते हैं उन सभी का एक ही उद्देश्य होता है कि सुनने और सुनाने वालों में सकारात्मक परिवर्तन आ जाए्।

सामायिक करना सकारात्मक बदलाव नहीं है वह बाहरी परिवर्तन है, लेकिन अंतर में समता भाव आएगा तभी आंतरिक परिवर्तन आएगा यह जरूरी है। इसके साथ बाहरी परिवर्तन सोने पर सुहागा के समान दूसरों को आकर्षित करने वाला होता है। संसार को दुखों का हार बताते हुए उन्होंने कहा कि पूर्णतः व्यक्ति सुख से रह सके यह संभव नहीं है। वह चाहे अमीर हो या गरीब।

व्यक्ति को अपने परिश्रम का निष्कर्ष निकालना चाहिए। दुख से सुख में जाने के प्रयास की बजाय दुर्गुणों से सद्गुणों, बुराई से अच्छाई, पाप-पुण्य की ओर जाने का जतन करना चाहिए। उन्होंने कहा, दुख से सुख में जाने में सफलता मिले, यह जरूरी भी नहीं है, लेकिन दुर्गुणों से सद्गुणों में आ गए तो कोई आपको दुखी कर ही नहीं सकता है।

मुनिश्री ने कहा कि यदि जीवन में दुख है तो दुर्गुणों की वजह से है, वह अभिमान, क्रोध, छल कपट, स्वार्थ या लालच के रूप में होते हैं। उन्होंने कहा, व्यक्ति क्रोध से क्षमा की ओर चला जाए वह अनंत असीम आनंद की उपलब्धि प्रदान करता है। सुख को भी दो प्रकार का होना बताते हुए मुनिश्री ने कहा एक सुख साधनों से मिलता है, एक सुख साधना से मिलता है।

उन्होंने कहा, मन खुश है तो तन भी स्वस्थ है। मन को खुश रखने के लिए विवेक, प्रेम, परमार्थ, स्वार्थरहित परोपकार से, सेवा से जुड़ा होना तथा प्रेम से भरपूर रखना जरूरी है। मन की खुशी सदगुणों पर ही निर्भर है। अच्छाइयां यदि व्यक्ति के पास हों तो झोपड़ी में रहने वाला भी महलों जैसा आनंद प्राप्त कर सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि बुरा करने वाले का भगवान भी भला नहीं कर सकता है और भला करने वाले का भगवान बुरा नहीं होने देते हैं। इससे पूर्व श्री ऋषि मुनिजी ने गीतिका सुनाई। धर्मसभा में श्री उपप्रवर्तक पारसमुनिजी ने मांगलिक प्रदान की। चिकपेट शाखा के महामंत्री गौतमचंद धारीवाल ने संचालन किया।

धारीवाल ने बताया कि मंगलवार को चौमुखी जाप के लाभार्थी का रवींद्रमुनिजी ने राजेन्द्र अजय गादिया परिवार का जैन दुपट्टा ओढ़ाकर सम्मान किया। उन्होंने बताया कि धर्म सभा मे आध्यात्मिक चातुर्मास के मुख्य संयोजक रणजीतमल कानूंगा, राजेन्द्र कोठारी, आनंद फूलफगर, डूंगरमल बाफना, कंवरलाल ताले़डा, हस्तीमल कोठारी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

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