acharya mahashraman ji
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चेन्नई/दक्षिण भारत। यहां के माधावरम स्थित तेरापंथ नगर में महाश्रमण समवसरण में चातुर्मासार्थ विराजित आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पर्युषण पर्व के पहले दिन बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते कहा कि इस दुनिया में कई प्रकार के दान होते हैं। कोई अन्नदान, वस्त्रदान, जलदान, आवासदान, ज्ञानदान आदि करता है।

उन्होंने कहा, सभी प्रकार के दानों का अपना-अपना महत्त्व हो सकता है किन्तु अभयदान दुनिया में सर्वश्रेष्ठ दान होता है। सभी प्रकार के प्राणियों को अभय का दान दे देना सर्वश्रेष्ठ दान है। आचार्यश्री ने शुक्रवार को पर्युषण के संदर्भ में प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि वर्ष के बारह महीनों में चातुर्मास के चार माह उत्तम होते हैं।

उनमें भी श्रावक और भाद्रपद माह विशिष्ट होते हैं। इनमें भाद्रपद का अपना महत्त्व है। भाद्रपद में भी इन नौ दिनों का अति विशिष्ट अथवा अति विशिष्टतम महत्त्व होता है। यह महापर्व अध्यात्म से जुड़ा हुआ है। इसमें जितना संभव हो, आगम स्वाध्याय का क्रम चलना चाहिए। प्रवचन करना और प्रवचन सुनना दोनों ही स्वाध्याय है।

उन्होंने कहा, व्यक्ति प्रवचन को भी ध्यान से श्रवण करे तो स्वाध्याय का लाभ प्राप्त हो सकता है। पर्युषण के प्रथम दिन को खाद्य संयम दिवस के रूप में मनाया जाता है। व्यक्ति को अपने खान-पान का सीमाकरण करने का प्रयास करना चाहिए। आहार शरीर का एक आधार है। व्यक्ति को भोजन में संयम रखने का प्रयास करना चाहिए।

इस दौरान आज के ही दिन तेरापंथ के चतुर्थ आचार्य श्रीमज्जयाचार्य के जन्मदिवस पर भी लोगों को पावन प्रेरणा प्रदान की और उनका श्रद्धा के साथ स्मरण भी किया गया। इसके पूर्व मुख्यमुनिश्री ने ‘गाथा गौरव’ का सुमधुर संगान किया। प्रवचन से पूर्व आचार्यश्री ने केशलोचन किया।

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