general shahnawaz khan
general shahnawaz khan

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 अक्टूबर को लालकिले पर तिरंगा फहराकर नेताजी सुभाष और भारत के उन वीरों को नमन किया जिन्होंने जंगे-आज़ादी में अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था। इसके बाद लोग इंटरनेट पर नेताजी सुभाष के वीडियो, आज़ाद हिंद सरकार और आज़ाद हिंद फ़ौज के सेनानियों के बारे में जानकारी हासिल कर रहे हैं।

उस समय नेताजी अपने देशवासियों के लिए दुनिया के सबसे मजबूत साम्राज्य के खिलाफ जंग लड़ रहे थे। उन्हें ऐसे साथी भी मिले जो उनके एक इशारे पर जान की बाजी लगाने को तैयार थे। भारत के ऐसे ही एक सपूत का नाम है जनरल शाहनवाज़ ख़ान।

शाहनवाज़ नेताजी सुभाष की फौज में अफसर थे। वे नेताजी के सबसे करीबी और भरोसेमंद लोगों में से थे। जब 1947 में देश आज़ाद हुआ तो भारी अफरातफरी का माहौल था। हमें आज़ादी की सौगात मिली और बंटवारे का जख्म भी।

उस दौर में जिन्ना के लुभावने भाषण सुनकर काफी लोग पाकिस्तान जा रहे थे, लेकिन शाहनवाज़ पर उनके भाषणों का कोई असर नहीं हुआ। बता दें कि शाहनवाज़ जिस इलाके से ताल्लुक रखते थे, वह पाकिस्तान में था। रावलपिंडी के गांव मटौर में 24 जनवरी, 1914 को उनका जन्म हुआ था।

बंटवारे के बाद उन्होंने पाकिस्तान के बजाय भारत में रहना पसंद किया। वजह थी नेताजी सुभाष से किया गया वादा। उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज के सुप्रीम कमांडर नेताजी सुभाष के सामने कसम खाई थी कि वे आखिरी सांस तक भारत की आज़ादी और बेहतरी के लिए काम करते रहेंगे।

अपने वचन का पालने करने के लिए उन्होंने भारत आने का फैसला कर लिया। पाकिस्तान में उनका परिवार बहुत प्रभावशाली था। उनके कई रिश्तेदारों ने उन्हें रोका कि भारत न जाओ। अब हमारा भविष्य पाकिस्तान ही है। वहां तुमसे बुरा बर्ताव किया जाएगा। उन्हें पाकिस्तान की सेना में बड़े ओहदे के प्रलोभन दिए गए, लेकिन जनरल शाहनवाज़ ने उनकी बात नहीं मानी। वे भारत आ गए और अपनी आखिरी सांस तक यहीं रहे।

दूसरे महायुद्ध के बाद जब हालात तेजी से बदले तो उन्हें ब्रिटिश सरकार ने कैद कर लिया और मुकदमा चलाया। अंग्रेज उन्हें फांसी की सजा देना चाहते थे लेकिन शाहनवाज़ ख़ान उससे जरा भी नहीं डिगे।

आज़ादी के बाद उन्होंने नेताजी सुभाष के नाम पर सुभाषगढ़ नामक गांव बसाया जो उत्तराखंड में है। उन्होंने मेरठ से चुनाव लड़ा और सांसद बने। उन्होंने वर्ष 1957, 1962 और 1971 में जीत दर्ज की। शाहनवाज़ ख़ान केंद्र में मंत्री भी रहे थे। नेताजी सुभाष के इस वफादार सिपाही ने 9 दिसंबर, 1983 को आखिरी सांस ली और इसी हिंदुस्तान की मिट्टी में समा गए।

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