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नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को पटाखों के निर्माण, बिक्री और अपने पास रखने के संबंध में अहम फैसला सुनाया। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि पटाखों की बिक्री पर देशव्यापी प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा। न्यायालय ने कुछ शर्तें भी रखी हैं। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दिवाली का त्योहार करीब है। न्यायालय के फैसले का हजारों पटाखा विक्रेता बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। अपने फैसले में न्यायालय ने कहा है कि यह प्रयास किया जाए कि कम प्रदूषण वाले पटाखों का इस्तेमाल हो जिससे पर्यावरण को क्षति न पहुंचे। न्यायालय ने ऐसे पटाखों के उत्पादन और बिक्री की इजाजत दी है जो पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाते हैं और उनसे कम उत्सर्जन होता है।

त्योहार पर यह असर
उच्चतम न्यायालय के इस फैसले का असर दिवाली पर दिखाई देगा। अब दिल्ली सहित पूरे भारत में लोग पटाखे चलाकर खुशियां मना सकेंगे। हालांकि इस दौरान न्यायालय के फैसले के अन्य बिंदु पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए जिसके तहत उसने पर्यावरण का ध्यान रखने का जिक्र किया है। ऐसे पटाखों से बचना चाहिए जो बहुत ज्यादा प्रदूषण फैलाकर पर्यावरण और समाज को नुकसान पहुंचाते हैं।

समय सारिणी भी दी
उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न पर्व-त्योहारों पर पटाखे चलाने के लिए एक समय सारिणी भी दी है। उसके अनुसार, यदि आप दिवाली पर पटाखे चलाना चाहते हैं तो इसके लिए समय रात 8 बजे से रात 10 बजे तक है। इसी प्रकार यदि कोई क्रिसमस और नए साल पर रात को पटाखे चलाना चाहता है तो उसके लिए समय 11.45 से 12.45 (रात्रि) निर्धारित किया गया है। किसी भी विक्रेता को आॅनलाइन पटाखे बेचने की इजाजत नहीं होगी। पटाखा बिक्री के लिए लाइसेंस ​अनिवार्य होगा। न्यायालय ने कहा कि पटाखों से होने वाला शोर तय ध्वनि मानकों से ज्यादा नहीं होना चाहिए। इसके अलावा पटाखे बनाने में इस्तेमाल होने वाले बेरियम सॉल्ट जैसे रसायनों पर रोक लगा दी है। पटाखों की लड़ियां चलाना भी प्रतिबंधित हो गया है। न्यायालय ने कहा है कि संबंधित पुलिस थाने के थानाध्यक्ष इस आदेश का पूर्ण पालन सुनिश्चित करवाएंगे। अगर कोई इसकी अवहेलना करता है तो उसे उच्चतम न्यायालय के आदेश की अवहेलना का आरोपी माना जाएगा।

फैसले के मायने
न्यायालय ने पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध न लगाकर कुछ शर्तों के साथ इसकी इजाजत दी है। इस तरह न्यायालय का फैसला लोगों को अपनी जिम्मेदारी का बोध कराने के लिए नसीहत ज्यादा प्रतीत होता है। अगर लोग पर्यावरण की चिंता को ध्यान में रखकर भारी प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों से बचेंगे तो इसका फायदा पर्यावण और समाज को होगा।

साथ ही न्यायालय द्वारा समय सारिणी तय कर देने से दूसरों को होने वाली परेशानी कुछ कम होगी। अक्सर देखने में आता है कि त्योहारों पर काफी लोग देर रात तक पटाखे चलाते रहते हैं। इससे दूसरों की नींद में खलल पड़ता है। साथ ही बच्चों, बुजुर्गों और रोगियों को खासी तकलीफ होती है। पटाखों के शोर से पालतू जानवर भी भयभीत हो जाते हैं। बता दें कि 2016 में दिवाली पर दिल्ली का वायु सूचकांक 426 था, जो 2017 में 326 रहा।

स्वास्थ्य का अधिकार बनाम व्यापार
बता दें कि जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की बेंच ने इस मामले पर 28 अगस्त को ही अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इससे पहले न्यायालय ने याचिककर्ताओं, पटाखा कारोबारियों, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और एनजीओ को अपना पक्ष रखने को कहा था। मामले की सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि स्वास्थ्य के अधिकार और व्यापार के बीच सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि याचिका पर विचार करते समय पटाखा उत्पादकों के आजीविका के मौलिक अधिकार और भारत की 1.3 अरब जनता के स्वास्थ्य के अधिकार सहित कई पहलुओं को ध्यान में रखना होगा। न्यायालय ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) सभी वर्गों पर लागू है। ऐसे में पूरे देश में पटाखों पर पाबंदी लगाते समय संतुलन कायम रखने की जरूरत है।

उल्लेखनीय है कि कई एनजीओ और स्वास्थ्य के क्षेत्र में शोध करने वाली संस्थाएं यह मांग कर चुकी हैं कि पटाखों का धुआं और शोर स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होता है, लिहाजा इन पर प्रतिबंध लगाया जाए। इनका तर्क है कि दमा और हृदय रोगियों के लिए दिवाली और उसके आसपास का समय काफी कठिनाई भरा होता है। कई रिपोर्टों में बताया गया है कि दिल्ली जैसे इलाकों में दमा की परेशानी से जूझ रहे लोग दिवाली से कुछ समय पहले अन्यत्र चले जाते हैं ताकि उन्हें पटाखों का धुआं ज्यादा परेशान न करे। न्यायालय ने पिछले साल दिवाली से पहले दिल्ली और एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था,​ जिसके बाद पटाखा कारोबारियों का व्यापार प्रभावित हुआ था।

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