जब 1947 में विभाजन हुआ तो सिंध में रहने वाले कई हिंदू व सिक्ख श्रद्धालुओं को यहां आसरा मिला था। जब चारों ओर भयंकर दंगे हो रहे थे, तब यह मंदिर उनका रक्षक बनकर सामने आया।

कराची। वर्ष 1947 में भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हो गया लेकिन आज भी हमारे कई तीर्थस्थल सरहद पार मौजूद हैं। इन मंदिरों में किसी समय बहुत भीड़ हुआ करती थी। अब ज्यादातर सुनसान हैं। हालांकि पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं की इन मंदिरों के साथ आस्था जुड़ी है। वे खास मौकों पर यहां इकट्ठे होते हैं। पाकिस्तान में ऐसा ही एक प्रसिद्ध मंदिर है पंचमुखी हनुमान। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यहां पांच मुख वाले हनुमानजी विराजमान हैं।

यह मंदिर प्रसिद्ध शहर कराची में है और बहुत पुराना है। श्रद्धालु कहते हैं कि यह सैकड़ों साल पुराना स्थान है, जो बहुत चमत्कारी है। यहां काफी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और भगवान को नमन करते हैं। ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, वर्ष 1882 में इसका पुनर्निर्माण हुआ था। इस मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा 11 परिक्रमाएं लगाने का विधान है। कहते हैं कि इससे हनुमानजी प्रसन्न होते हैं और वे शीघ्र ही अपने भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं।

जब श्रद्धालु की मनोकामना पूर्ण हो जाती है तब वे 21 परिक्रमाएं लगाते हैं। कई लोगों ने कहा है कि इस स्थान पर मनौती मांगने से हनुमानजी ने उनकी प्रार्थना सुनी। पंचमुखी हनुमान मंदिर सिर्फ पूजा-अर्चना के लिए ही नहीं, बल्कि कई श्रद्धालुओं की जान बचाने के लिए भी जाना जाता है।

जब 1947 में विभाजन हुआ तो सिंध में रहने वाले कई हिंदू व सिक्खों को यहां आसरा मिला था। जब चारों ओर भयंकर दंगे हो रहे थे, तब यह मंदिर उनका रक्षक बनकर सामने आया। यहां हिंदू-सिक्ख श्रद्धालु रुके रहे और आशीर्वाद लेने के बाद भारत आए। जिनके बड़े-बुजुर्ग विभाजन के दौरान कराची से भारत आए, उन्होंने इस मंदिर की कथा सुनी होगी। इस तरह पंचमुखी हनुमान भक्तों के जीवनरक्षक बने।

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