बेंगलूरु। राज्य मंत्रिमंडल द्वारा सोमवार को वीरशैव और लिंगायत समुदायों को दो अलग धर्म मानते हुए लिंगायतों को राज्य में अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दिए जाने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजने का निर्णय लिए जाने पर विवाद शुरू हो गया है। सोमवार को मंत्रिमंडल की बैठक में यह निर्णय लिए जाने के तुरंत बाद भाजपा नेता मोहन लिंबिकाई और सशील नामोशी ने इसके विरोध में एक संयुक्त बयान जारी किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने चुनावी रणनीति के तहत इन दोनों समुदायों को बांटने का प्रयास किया है, जबकि वीरशैव और लिंगायत समुदाय शुरू से एक ही हैं। बयान के मुताबिक, इन समुदायों को बांटने के लिए गठित विशेषज्ञ समिति ने इस विषय में अपनी सिफारिशें देने के लिए सरकार से छह महीने का समय मांगा था लेकिन सरकार ने इस पर दो महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट सौंपने का दबाव बनाया। इससे स्पष्ट होता है कि राज्य की मौजूदा कांग्रेस सरकार इस मुद्दे का राजनीतिक इस्तेमाल करना चाहती है। संयुक्त बयान में कहा गया है कि समिति की एकतरफा रिपोर्ट पर राज्य मंत्रिमंडल ने सोमवार को लिंगायतवीरशैव और बसवतत्व अनुयायी (संत बसवेश्वर के दर्शन के अनुयायी) समुदायों को अलग करने के लिए केंद्र सरकार से अधिसूचना जारी करने का अनुरोध भेजने को मंजूरी दे दी है। इस अधिसूचना में लिंगायत समुदाय को कर्नाटक में अल्पसंख्यक दर्जा देने की भी सिफारिश की जाएगी। दोनों भाजपा नेताओं ने इसका विरोध करते हुए कहा कि बसवतत्व अनुयायी समुदाय का अर्थ स्पष्ट नहीं है। राज्य में अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों के लोग भी संत बसवेश्वर के एकांत अनुयायी हैं। इस आधार पर भाजपा नेताओं ने संयुक्त बयान में वीरशैव और लिंगायत समुदायों को अलगअलग करने के कदम को एक ’’खतरनाक साजिश’’ करार दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा अब भी वीरशैव महासभा और सिद्दगंगा के शिवकुमार स्वामीजी के निर्णय का समर्थन करती है, जिसने राज्य सरकार द्वारा दोनों समुदायों को बांटने के प्रस्ताव का शुरू से विरोध किया है।

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