चेन्नई। राज्य में डेनमार्क और स्वीडन से ज्यादा पवन ऊर्जा है और राज्य कपवन ऊर्जा में दुनिया का सबसे अग्रणी क्षेत्र बनने की ओर कदम ब़ढाता दिख रहा है। लेकिन यह मुकाम हासिल करने से पहले तमिलनाडु को कई चुनौतियों से निपटना होगा। अमेरिका स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ एनर्जी इकॉनोमिक्स एंड फाइनेंशियल एनेलिसिस की रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है कि साल २०२७ तक तमिलनाडु में आधे से अधिक ऊर्जा का उत्पादन शून्य उत्सर्जन तकनीक यानी पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा के माध्यम से होने लगेगा। मौजूदा वक्त में तमिलनाडु के पास ७.८५ गीगावॉट विंड पावर की क्षमता है। यह क्षमता डेनमार्क और स्वीडन से अधिक है और रिपोर्ट के अनुसार यह आंक़डा आने वाले दशक में दोगुना हो जाएगा, साथ ही सौर ऊर्जा के आंक़डों में भी जबरदस्त वृद्धि दर्ज की जाएगी और वह १३.५ गीगावॉट तक पहुंच जाएगा।र्ंर्ैंज्य्श्च ूय्ष्ठख़य् द्बष्ठ्र द्धख्रध्य्प् ·र्ैंर्‍ र्ज्ङैंद्यत्रअगर यह अनुमान सच साबित होता है तो तमिलनाडु की कुल ऊर्जा क्षमता में से ६७ प्रतिशत हिस्सा साफ और दोबारा प्रयोग की जा सकने योग्य ऊर्जा का होगा। इसका एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि इससे राज्य को अपना कर्ज कम करने में बहुत मदद मिलेगी। लेकिन इस ऊर्जा का प्रयोग करने से पहले तमिलनाडु को अपने ऊर्जा क्षेत्र में ब़डे बदलाव करने की ़जरूरत है। तमिलनाडु की जनसंख्या ऑस्ट्रेलिया से तीन गुना अधिक है, वहीं इसकी प्रति व्यक्ति आय श्रीलंका और यूक्रेन के आस-पास है। यह आंक़डा इतना समझाने के लिए काफी है कि ब़ढती हुई अर्थव्यवस्था में कार्बन उत्सर्जन का खतरा भी ब़ढता चला जाता है। एक अनुमान के मुताबिक तमिलनाडु की जीडीपी सालाना ७ प्रतिशत की दर से ब़ढेगी। रिपोर्ट बताती है कि इस वृद्धि में पुनरोत्सर्जित ऊर्जा का अहम योगदान होगा।प्रय्रुर्ङैंृय्त्र द्बष्ठ्र झ्ठ्ठणक्कष्ठख्य् ृय्यत्र्श्च·र्ैं द्नय्द्यराज्य पर आर्थिक भार पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा के प्लांट को पूरी तरह स्थापित करने और उन्हें उपयोग में लाने के लिए जो खर्च आएगा वह कोयले से प्राप्त होने वाली ऊर्जा के मुकाबले बहुत अधिक नहीं रहेगा। हालांकि रिपोर्ट यह भी कहती है कि तमिलनाडु को कोयला और परमाणु ऊर्जा की आवश्यकता भी रहेगी साथ ही इस परियोजना से राज्य पर आर्थिक भार भी प़डेगा। नए कोयला पावर प्लांट से बिजली उत्पादन करने का खर्च सौर ऊर्जा या विंड पावर के मुकाबले दोगुना है। वित्तीय हालात के निराशाजनक होने के बावजूद तमिलनाडु में २२.५ गीगावॉट ऊर्जा कोयला पावरप्लांट से करने की योजना अभी पाइपलाइन में है। कोयला पावरप्लांट से जु़डी इन योजनाओं को आगे ब़ढाने से राज्य पर वित्तीय भार को कम करने के साथ ही स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में आगे ब़ढने में भी कई मुश्किलें ख़डी हो जाएंगीं।·र्ष्ठैंप्ध् द्बंश्च फ्ष्ठ ृ€ट्टरूद्धद्य ·र्ष्ठैं द्धर्‍घ् ब्ह् फ्·र्ैंत्रय् ब्स् झ्प्द्म र्ंर्ैंज्य्श्च ·र्ैंय् र्ह्वझ्य्ख्रद्मपवन ऊर्जा का उत्पादन केवल मई से अक्टूबर माह के बीच ही किया जा सकता है। यहां तक कि इन महीनों में भी बिजली का उत्पादन अपने सर्वोच्च स्तर पर नहीं रहेगा क्योंकि अन्य राज्यों को अतिरिक्त बिजली देने के लिए राज्य के पास पर्याप्त ग्रिड नहीं है। इसका एक मतलब यह भी हुआ कि वर्ष के बाकी बचे सात महीनों में जब हवा बहुत तेज नहीं चलती तब तमिलनाडु अन्य राज्यों से सस्ती बिजली का निर्यात नहीं कर पाएगा। नए ग्रिड लगाने का काम राज्य में चल तो रहा है लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं कि ग्रिड की संख्या ब़ढने से अनुमानित बिजली का उत्पादन पूरा किया जा सकेगा। मौसम आधारित श्रोतों से बिजली का उत्पादन करने के लिए स्मार्ट ग्रिड की जरूरत प़डती है, इस ग्रिड का सिस्टम हवा की उपलब्धता के अनुसार खुद को ढाल लेता है। स्मार्ट ग्रिड के क्षेत्र में भी तमिलनाडु को अभी लंबा रास्ता तय करना है।

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