नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि विश्व धरोहर ताजमहल की सुरक्षा और संरक्षण के बारे में दृष्टिपत्र पेश करे। न्यायालय ने साथ ही यह भी जानना चाहा कि अचानक ताज ट्रापेजियम क्षेत्र में तमाम गतिविधियां तेज कैसे हो गई हैं। न्यायमूर्ति मदन बी. लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सालिसीटर जनरल तुषार मेहता से जानना चाहा कि ताज ट्रापेजियम क्षेत्र में चम़डा उद्योग और होटल क्यूं बन रहे हैं जबकि पहले इस क्षेत्र में इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगा दी गई थी।पीठ ने सवाल किया, अचानक इस क्षेत्र में इस तरह की गतिविधियां तेज होने की क्या कोई खास वजह है? क्यों? यह बंद ही रहनी चाहिए। इस क्षेत्र में ये गतिविधियां क्यों चल रही हैं? ताज ट्रापेजियम क्षेत्र १०,४०० वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र है जिसके दायरे में उत्तर प्रदेश के आगरा, फिरोजाबाद, मथुरा, हाथरस और एटा जिले तथा राजस्थान का भरतपुर जिला आता है। मेहता ने कहा कि वह इस बारे में आवश्यक निर्देश प्राप्त करके न्यायालय को इससे अवगत कराएंगे। पीठ ने राज्य सरकार को १७वीं सदी के इस स्मारक के संरक्षण के बारे में चार सप्ताह के भीतर दृष्टिपत्र पेश करने का निर्देश दिया।न्यायालय ने पिछले साल दिसंबर में राज्य सरकार से कहा था कि प्रसिद्ध ताजमहल की सुरक्षा और संरक्षण, इसके पर्यावरण और ताज ट्रापेजियम क्षेत्र के बारे में भावी योजना और विस्तृत दृष्टिपत्र पेश किया जाए। इस मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने एक अर्जी दायर कर आगरा में जलापूर्ति हेतु पाइपलाइन बिछाने की खातिर २३४ वृक्षों को काटने की अनुमति मांगी। सरकार के वकील ने कहा कि १३० किलोमीटर लंबी पाइप लाइन में से १२२ किलोमीटर बिछाई जा चुकी है और आठ किलोमीटर लाइन के लिए २३४ वृक्ष काटने होंगे। इस पर, पीठ ने कहा कि वृक्षों की कटाई की दर करीब ८० प्रतिशत है जबकि नए पौधे लगाने के लिए भूमि ही नहीं है। पीठ ने राज्य सरकार को यह जानकारी भी देने का निर्देश दिया कि पौधे लगाने के लिए इस क्षेत्र में जमीन कहां उपलब्ध है। न्यायालय ने वहां लगाए गए पौधों की संख्या का विवरण भी मांगा है। इस सारे प्रकरण को लेकर जनहित याचिका दायर करने वाले पर्यावरणविद अधिवक्ता महेश चन्द्र मेहता ने पीठ से कहा कि वह पिछले महीने इस स्मारक के संरक्षण के बारे में चर्चा के लिए संबंधित प्राधिकारियों की एक बैठक में शामिल हुए थे। उन्होंने कहा कि उनकी राय में कोई संतोषजनक विचार विमर्श नहीं हुआ था। इस पर अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि बैठक की कार्यवाही संकलित की गई है और न्यायालय के निर्देशानुसार इस विचार विमर्श में सिविल सोसायटी के सदस्यों ने भी हिस्सा लिया था।

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