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बेंगलूरु। हर साल दशहरे पर रावण का दहन होता है। लोग खुशी और उत्साह के माहौल में रावण के पुतले का दहन करते हैं, भगवान श्रीराम की जय-जयकार करते हैं और फिर अपने घरों को लौट जाते हैं। वास्तव में दशहरा सिर्फ रावणदहन तक ही सीमित नहीं है। इसका बहुत गहरा संदेश है जिसे आज हर मनुष्य को सीखने की जरूरत है। जानिए दशहरे पर हमें रावण के जीवन से क्या सबक सीखने चाहिए।

1. ज्ञान-विज्ञान में पारंगत होना अच्छी बात है लेकिन उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है उसका उपयोग। यदि कोई शख्स अपनी योग्यता, परिश्रम, तपस्या और विचारों का उपयोग सकारात्मक दिशा में करता है तो संसार उसकी जय-जयकार करता है। उसका अनुसरण करना चाहता है, परंतु यदि वह दुष्ट प्रवृत्ति के वशीभूत होकर इनका दुरुपयोग करता है तो उसके पतन को कोई नहीं रोक सकता। फिर चाहे वह शख्स कितना ही बड़ा ज्ञानी और भक्त क्यों न हो।

2. अच्छे चरित्र की महत्ता आज भी उतनी ही है जितनी कि त्रेता युग में थी। मनुष्य को संयम, सदाचार, करुणा, दया और विचारों की पवित्रता का बहुत ध्यान रखना चाहिए। अगर इनमें भटकाव आ गया तो देर-सबेर पतन होना तय है। मनुष्य को हर तरह के व्यसन से दूर रहना चाहिए।

3. जिसके पास अहंकार है, उसे भला शत्रु की क्या आवश्यकता! स्वयं की योग्यता और सामर्थ्य में विश्वास होना एक सद्गुण माना जा सकता है, लेकिन यदि दूसरों को कमतर आंका जाए और स्वयं को ही सबसे ऊंचा समझने का भाव मन में बैठ जाए तो यह अहंकार बन जाता है। अहंकार ने रावण जैसे बलशाली को नष्ट कर दिया था, तो साधारण मनुष्य है ही क्या!

4. रावण सदैव चापलूसों से घिरा रहता था। लंका में विभीषण भी रहते थे परंतु उसने उनकी किसी भी सलाह पर अमल नहीं किया। कई लोग लंका के विनाश के​ लिए विभीषण को उत्तरदायी ठहराते हैं और उन्होंने इस महान रामभक्त के लिए आपत्तिजनक कहावतें बना रखी हैं। रावण अपने विनाश के लिए स्वयं उत्तरदायी था। विभीषण ने तो उसे हर बार रोकना चाहा था।

आखिर में उसने विभीषण को लंका से अपमानित कर निकाला था। उसके दरबार में कई चापलूस भरे थे जो अक्सर उसे उकसाते रहते थे। विभीषण के जाने के बाद लंका श्रीहीन हो गई और शीघ्र ही रावण का नाश हो गया। इसलिए रावण के जीवन और मृत्यु में यह सबक छुपा है कि हमेशा सत्य बोलने वाले, सही सलाह देने वाले का संग करना चाहिए। चापलूसों के साथ रहने वाला अवश्य ही पतन को प्राप्त होता है।

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