श्रवणबेलगोला। राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने बुधवार को कहा कि श्रवणबेलगोला में सदियों पुरानी बाहुबली की यह प्रतिमा शांति और उपकार को परिलक्षित करती है जो मौजूदा समय में तनाव और आतंकवाद के साथ जूझती मानवता को सहानुभूति प्रदान करती है। उन्होंने कहा, इस स्थान पर आप सब के बीच आकर तथा शांति, अहिंसा और करुणा के प्रतीक भगवान बाहुबली की इस भव्य प्रतिमा को देखकर मुझे अपार प्रसन्नता हो रही है। यह क्षेत्र धर्म,अध्यात्म और भारतीय संस्कृति का केंद्र रहा है और सदियों से मानवता के कल्याण का संदेश देता रहा है।उन्होंने कहा, हम सभी जानते हैं, आदिनाथ ऋषभदेव के पुत्र भगवान बाहुबली चाहते तो अपने भाई भरत के स्थान पर राजसुख भोग सकते थे लेकिन उन्हांेने अपना सब कुछ त्याग कर तपस्या का मार्ग अपनाया और पूरी मानवता के कल्याण के लिए अनेक आदर्श प्रस्तुत किए। लगभग एक हजार वर्ष पहले बनाई गई यह प्रतिमा उनकी महानता का प्रतीक है। इस प्रतिमा के कारण यह स्थान आज देश-विदेश में आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।फ्य्ैंड·र्ल्ैं्यत्र·र्ैं ृय्स्द्य द्नह्रख्ह्यध्·र्ैं ॅ·र्ैंत्रय् ·र्ैंय् झ्श्नय्घ्र्‍द्म ·र्ष्ठैं़त्त्श्न ब्स् य्प्ह्लय्द्धष्ठयख्ह्यय्कोविंद ने कहा, जैन परंपरा की धाराएं पूरे देश को जो़डती हैं। मैं जब बिहार का राज्यपाल था तब वैशाली क्षेत्र में भगवान महावीर की जन्मस्थली, और नालंदा क्षेत्र में उनकी निर्वाण-स्थली पावापुरी में कई बार जाने का मुझे अवसर मिला। अब आज यहां श्रवणबेलगोला में आकर, मुझे उसी महान परंपरा से जु़डने का एक और अवसर प्राप्त हो रहा है। उन्होंने कहा कि यह स्थान हमारे देश की सांस्कृतिक और भौगोलिक एकता का एक बहुत ही प्राचीन केंद्र रहा है। लगभग तेइस सौ वर्ष पूर्व, मध्य प्रदेश के उज्जैन क्षेत्र से जैन आचार्य भद्रबाहु यहां पधारे थे। बिहार के पटना क्षेत्र से उनके शिष्य और विशाल मौर्य साम्राज्य के संस्थापक सम्राट चन्द्रगुप्त यहां आए थे। उस समय वह अपनी शक्ति के शिखर पर रहते हुए भी, सारा राज-पाट अपने पुत्र बिन्दुसार को सौंपकर यहां आ गए थे। सम्राट चन्द्रगुप्त ने भी संल्लेखना का मार्ग अपनाया और अपना शरीर त्याग किया। उन राष्ट्र निर्माताओं ने शांति, अहिंसा, करुणा और त्याग पर आधारित परंपरा की यहां नींव डाली। धीरे-धीरे पूरे देश के अनेक क्षेत्रों से लोग यहां आने लगे। इस प्रकार इस क्षेत्र का आकर्षण ब़ढता गया।

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