sadhvi madhusmita ji
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बेंगलूरु/दक्षिण भारत। यहां के तेरापंथ सभा विजयनगर के तत्वावधान में अर्हम भवन में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वीश्री मधुस्मिताजी ने कहा कि पर्युषण महापर्व का आगमन पुष्कलावते मेघ के समान है। पुष्कलावते मेघ के बरसने से तवे जैसी गर्म धरती ठंडी हो जाती है। वैसे ही पर्युषण के आठ दिनों तक समता साधकों द्वारा जिनवाणी की अमृत वर्षा होगी।

उन्होंने कहा, कषाय से उत्तम बनीं आत्माएं जिनवाणी का श्रवण कर शीतल चंदन बन जाएंगी। दूसरे दिन के प्रवचन में साध्वीश्री ने कहा कि स्वाध्याय व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण साधन है। विश्व के अनेक महापुरुष स्वाध्याय का प्रयोग कर साधारण से असाधारण बने। इससे मन और बुद्धि के विकार मिटते हैं और चित्त की विकल्पशीलता समाप्त होती है।

स्वाध्याय से प्राप्त होने वाली एकाग्रता व्यक्ति को क्षेत्र में सफल बनाती है। स्वाध्याय 12 प्रकार के तप का आधार है। जितने कर्मों को अज्ञानी व्यक्ति करोड़ों वर्षों में क्षय कर सकता है, उतने कर्मों को ज्ञानी व्यक्ति स्वाध्याय द्वारा अल्पसमय में क्षीण कर लेता है। ज्ञान की प्रगति का सर्वोत्तम उपाय है स्वाध्याय।

तेरापंथ सभा के अध्यक्ष बंसीलाल पितलिया व महिला मंडल की अध्यक्षा सरोज टांटिया ने सभी का स्वागत किया और पर्युषण पर्व की जानकारी दी। कार्यक्रम का संचालन सभा मंत्री कमल तातेड़ व महिला मंडल की मंत्री महिमा पटावरी ने किया । साध्वीश्री की प्रेरणा से अनेक तपस्वियों ने तपस्याओं का प्रत्याख्यान ग्रहण किया।

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