चेन्नई/दक्षिण भारतयहाँ गोपालपुरम में लॉयड्स रोड स्थित भगवान महावीर वाटिका में चातुर्मासार्थ विराजित जैन संत श्री कपिल मुनि जी म.सा. के सान्निध्य व श्री जैन संघ के तत्वावधान में भगवान महावीर के २५४४ वें निर्वाण कल्याणक के प्रसंग पर आयोजित २१ दिवसीय श्रुतज्ञान गंगा महोत्सव का शुभारम्भ शुक्रवार को भगवान महावीर की अंतिम वाणी उत्तराध्ययन सूत्र के प्रथम अध्ययन विनय श्रुत के पारायण और वीर स्तुति के सामूहिक संगान से हुआ। मुनिश्री ने इस शास्त्र की महिमा बताते हुए कहा कि इस सूत्र में भगवान् महावीर की उन शिक्षाओं का संकलन है जिनको आत्मसात करने से जीवन की दशा और दिशा बदल जाती है। उत्तराध्ययन सूत्र का एक एक वचन चिन्तामणि के समान अनमोल है जिनसे जन्म जन्मान्तर की आतंरिक दरिद्रता को मिटाया जा सकता है। मुनि श्री ने प्रथम अध्ययन का विवेचन करते हुए कहा कि प्रभु महावीर ने अपनी अंतिम देशना में विनय का प्रशिक्षण दिया। क्योंकि विनय ही धर्म का मूल है। विनय गुण से ही जीवन में योग्यता आती है। विद्या से विनय और विनय से पात्रता आती है। योग्य व्यक्ति को ही सम्मान और यश मिलता है। अहंकारी व्यक्ति तो सर्वत्र अपमान और तिरस्कार के योग्य होता है।विनय के बगैर मोक्ष मार्ग की सभी साधना अधूरी और व्यर्थ है। इसलिए व्यक्ति को सर्व प्रथम विनय सम्पन बनना चाहिए।मुनि श्री ने कहा कि अहंकार से ब़ढकर जीवन में कोई अन्धकार नहीं है। अहंकारी के जीवन में सूर्योदय कभी नहीं होता। अहंकार पुष्टि की भावना से प्रेरित होकर किये गए धार्मिक क्रियाकलाप भी व्यर्थ और निष्फल हो जाते हैं। मुनिश्री ने कहा कि तीर्थंकर के अभाव में गुरु का स्थान सर्वोपरि होता है। जीवन विकास में गुरु कृपा ही मूलाधार है। अतः गुरुजनों के प्रति विनय का आचरण करना चाहिए। उनका अविनय, अवज्ञा और आशातना का पाप हर्गिज भी नहीं करना चाहिए। मुनिश्री ने आगे कहा कि विनय का तात्पर्य सिर्फ झुकना ही नहीं होता बल्कि विनय शब्द इतना व्यापक है कि इसमें शिष्टाचार से लेकर जीवन के सम्पूर्ण सदाचार का समावेश है। इसीलिए भगवान महावीर ने अपनी देशना का श्रीगणेश विनय व्यवहार की शिक्षा से किया। जीवन चाहे गृहस्थ का हो या साधु का। सभी के लिए जीवन व्यवहार का विज्ञान समझना बेहद जरुरी है। इसके अभाव में शिक्षित लोग भी अव्यवहारिक सिद्ध हो जाते हैं।

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