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एकाग्रता की एक अनुपम, आश्चर्यचकित करने वाली प्रस्तुति 2 सितंबर को

– श्रीकांत पाराशर, प्रमुख संपादक –

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। आने वाली 2 सितंबर को पैलेस ग्राउंड पर महाशतावधान महोत्सव आयोजित हो रहा है जिसमें जैन बालमुनि श्री पद्मप्रभचन्द्रसागरजी मन की एकाग्रता का अनुपम, विश्मयकारी उदाहरण प्रस्तुत करने वाले हैं। वे आचार्यश्री नयचंद्रसागरसूरीश्वरजी के शिष्य हैं और महाशतावधानी श्री अजीतचन्द्र सागरजी की प्रेरणा और मार्गदर्शन में इस अद्भुत उदाहरण प्रस्तुति की तैयारी में लगे हैं।

ऐसा नहीं है कि बालमुनि ऐसी प्रस्तुति पहली बार दे रहे हैं, वे मुंबई में शतावधान कार्यक्रम सफलतापूर्वक दे चुके हैं। मैं इन संतों के दर्शन करने अक्कीपेट मंदिर पहुंचा। बालमुनि से तो मेरी भेंट नहीं हो पायी क्योंकि उनकी एकाग्रता के प्रयासों में व्यर्थ का व्यवधान न आए इसलिए उन्हें एकांत में अपने अभ्यास के लिए पूरा समय दिया जा रहा है। परंतु मेरे जैसे जिज्ञासुओं के सवालों का जवाब बड़ी ही विनम्रता से मुनिश्री अजीतचन्द्र सागरजी दे रहे हैं क्योंकि वे स्वयं 500 वस्तुओं, सवालों की संख्या वाले महाशतावधान महोत्सव को सफलतापूर्वक संपन्न कर चुके हैं।

वे बताते हैं कि शतावधान को सामर्थ्य को ठीक से समझना है तो सबसे सरल तरीका है, कार्यक्रम में आकर स्वयं की आंखों से देखा जाए। वे कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति दांतों तले अंगुली दबाए बिना नहीं रह सकता क्योंकि यह कोई हाथ की सफाई नहीं है, मन की एकाग्रता है।

वे बताते हैं कि ऐसे कार्यक्रम पूर्व में मुंबई में किए जा चुके हैं और सफलतापूर्वक किए जा चुके हैं। प्रस्तुति की विधि में कार्यक्रम-दर-कार्यक्रम सुधार लाया गया है। वे कहते हैं कि धार्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, सामान्य ज्ञान-विज्ञान से जु़डे सवाल सभागार में उपस्थित लोगों में से पूछे जाते हैं, उनको याद रखना और फिर किसने किस क्रम पर सवाल किया था, वह संख्या क्रम भी ध्यान रखना और फिर सही सही बता देना, किसी गहन तपस्या के बिना संभव नहीं है।

मुनिश्री बताते हैं कि कई बार तो शतावधान को जटिल बनाने के लिए बीच-बीच में एक घंटे से आवाज भी की जाती है या कोई मधुर संगीत बजाया जाता है। बीच में ही कुछ वस्तुएं केवल एक क्षण के लिए दिखाई जाती हैं यानी एक मिनट से भी कम समय के लिए, महज कुछ सैकेंड के लिए साधक की इन वस्तुओं पर नजर पड़ती है। उधर सवाल पूछने का सिलसिला भी उस दौरान जारी रहता है।

बाद में शतावधानी मुनि न केवल सवालों को उसी क्रम में दोहराते हैं जिस क्रम में पूछे गए थे, बल्कि इस बीच घंटे को कितनी बार बजाया गया, यह भी बताते हैं और जो वस्तुएं क्षणभर के लिए दिखाई गईं, वे किस क्रम में रखी गई थीं, यह भी बता देते हैं। यह कोई तोतारटंत विद्या नहीं है कि कुछ सवाल जवाब रटा दिए और फिर लोगों के सामने उसी क्रम में बता दिए।

सभागार में उपस्थित विद्वानों द्वारा पूरी प्रक्रिया का अवलोकन किया जाता है। सामान्य व्यक्ति यही कहेगा कि यह एक चमत्कार ही है परन्तु यदि इसे चमत्कार न भी माना जाए तो भी यह कहना होगा कि जिस आत्मबल, तप, ध्यान और स्वनियंत्रण के अभ्यास से यह सिद्धि प्राप्त की गई है वह किसी चमत्कार से कम भी नहीं है। यह भी ध्यान में रखना है कि बालमुनि महज 17 वर्ष के हैं। इतनी कम उम्र में यह उपलब्धि विस्मयकारी है।

मुनिश्री अजीत चन्द्रसागरजी कहते हैं कि यह सहज नहीं है परन्तु असंभव भी नहीं है। उधर आचार्यश्री बताते हैं कि उन्होंने (अजीतचन्द्रसागरजी ने) स्वयं ने भी इसमें महारत हासिल की है और अब बालमुनि पद्मप्रभचन्द्र सागरजी को प्रेरित कर उन्हें भी महाशतावधानी बना रहे हैं। मुनिश्री ने कहा कि आत्मा पर ध्यानादि से नियंत्रण कर एकाग्रचित्त होकर सुनने, देखने और मनन करने से वस्तुएं, बातें, दृश्य सब कुछ मानस पटल पर मेमोरी की तरह अंकित हो जाते हैं और फिर उनका उसी क्रम में बखान करना तपस्वी और साधक के लिए आसान हो जाता है।

वे कहते हैं कि साधना से ही इस असंभव कार्य को संभव किया जा सकता है। वे विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति बढ़ाने के प्रयासों के तहत आने वाले दिनों में एक 36 दिनों की कार्यशाला या प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित करने के लिए वासु पूज्य स्वामी जैन संघ को कहेंगे जो कि यह महाशतावधान कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। इस कार्यक्रम को भव्य रूप देने और सफल बनाने में एक बडी टीम दिन-रात एक किए हुए है।

1 COMMENT

  1. नमस्ते। ध्यान साधना में अद्भुत क्षमता होती है। जो जितना ध्यान साधना करते हैं, वे उतना महान कार्य करने वाले होते हैं।

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