गुरु तत्व की महिमा अपरम्पार: आचार्यश्री रत्नसेनसूरीश्वरजी

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मैसूरु/दक्षिण भारत। स्थानीय महावीर भवन में सुमतिनाथ जैन संघ के तत्वावधान में चातुर्मासार्थ विराजित आचार्यश्री रत्नसेनसूरीश्वरजी ने सोमवार को सिंदूर प्रकरण ग्रंथ की विवेचना करते हुए कहा कि गुरु का सम्मान मोक्ष का द्वार है।

जीवन में अन्य गुणों के आत्मसात से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति हो भी सकती है और नहीं भी परन्तु अपने उपकारी गुरु के प्रति जिसके हृदय में पूर्ण बहुमान का भाव हो तो उस आत्मा को मोक्ष की अवश्य ही प्राप्ति होती है।

जगत के जीवों के उद्धार के लिए धर्मशासन की स्थापना करने वाले तीर्थंकर परमात्मा है, परन्तु उस शासन को दीर्घकाल तक चलाने वाल तो सद्गुरु ही होते हैं। देव, गुरु और धर्म रुपी तत्वत्रयी के बीच में गुरु को रखा गया है इसका आर्थ है कि देव और धर्म तत्व की पहचान कराने वाले गुरु ही होते हैं।

संसार में तीर्थंकरों का अस्तित्व मर्यादित समय के लिए ही होता है क्योंकि उनका आयुष्य परिमित होता है जबकि उनके अभाव में दीर्घकाल तक जगत के जीवों को धर्मबोध देने वाले सद्गुरु ही होते हैं।

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