दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबेंगलूरु। यहां देवनहल्ली स्थित स्थूलभद्रधाम में शिल्पकलामनीषी आचार्यश्री चंद्रयशसूरीश्वरजी ने मंगलवार को अपने उद्बोधन में कहा कि स्वीकारभाव में सुख है और इंकारभाव में दुख। जीवन में शुभ-अशुभ, अनुकूल-प्रतिकूल व सुख-दुख सब कर्माधीन हैं। उन्होंने कहा कि ध्वजा कौनसी दिशा में लहराएगी यह पवन के हाथ में होता है, ध्वजा के हाथ में नहीं। इसी प्रकार जीवन में कब व क्या होना है यह सब कर्मसत्ता के हाथ में है। आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में प्रसन्नता, शांति और सुख चाहिए तो परिस्थिति के अधीन नहीं बनना चाहिए। सुख हो या दुख इसे स्वीकार करना चाहिए तभी जीवन आनंदमय बनेगा। उन्होंने इस अवसर पर धाम की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जिस गिरिराज के कण-कण में अनंत सिद्धों का वास है व अणु-अणु में शक्ति है, ऐसे पावन गिरिराज की शिला (पाषाण) लाकर यहां स्थापित की गई है। तभी आज यहां साक्षात् पालीताणा के भाव आते हैं। आचार्यश्री ने शीघ्र ही नवटुंक, स्मृति मंदिर आदि अनेक निर्माण कार्यों के पूर्ण होने की मंगलकामना करते हुए कहा कि दक्षिण का यह गिरिराज भविष्य में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए तारक स्थान बनेगा। इससे पूर्व चंद्रयशजी के ३६वें सयंमवर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित नव्वाणुं यात्रा में आचार्यश्री व प्रवर्तकश्री कलापूर्णविजयजी की निश्रा में प्रातः आदिनाथ दादा के मुख्य दरबार में १८ महाभिषेक का आयोजन हुआ। दोपहर के सत्र में गिरिराज व गुरुराज वधावणा का कार्यक्रम आनंद व उल्लास से हुआ। इस अवसर पर अहमदाबाद के भाविक मेहता ने कहा कि गिरिराज की यात्रा करने से हमें गुरुराज मिले और गुरुराज के प्रभाव से गिरिराज की महिमा का ज्ञान हुआ। उन्होंने कहा कि आज से २० वर्षों पूर्व यहां पर जंगल व पर्वत था। तपागच्छाधिष्ठायक मणिभद्रजी के दिव्य संकेत से आचार्यश्री चंद्रयशजी यहां आए, फिर गुरुदेवश्री स्थूलभद्रसूरीश्वरजी के करकमलों से दक्षिण गिरिराज की स्थापना करवाई और आज यह तीर्थ पालीताणा का साक्षात्कार ले चुका है। उन्होंने कहा कि अनेक आत्माओं का सम्यकदर्शन जहां निर्मल होता है ऐसे पावन पवित्र पुण्यधाम में गुरुदेवश्री की निश्रा श्रद्धालुओं को मिल रही है। मेहता ने कहा कि यहां के कण-कण में प्रभु भक्ति है। उन्होंने कहा कि परमात्मा का साक्षात्कार जो प्रत्यक्ष करते हैं ऐसे आचार्यश्री का उपकार हम कभी नहीं भूल सकेंगे।

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