newborn baby with teeth
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बेंगलूरु। सामान्यत: बच्चों में दांतों का पहला जोड़ा 6 माह की उम्र में दिखता है। इन्हें कृंतक दांत कहते हैं। कुछ ही हफ्तों बाद ऊपरी चार कृंतक भी दिखने लगते हैं। इसके बाद अन्य दांत आने लगते हैं। ढाई-तीन साल में निचले जबड़े और ऊपरी जबड़े में 10-10 दांत निकल आते हैं। ये दूध के दांत कहलाते हैं।

फिर 6-12 वर्ष की आयु में दूध के दांत गिरने लगते हैं तथा उनकी जगह नए तथा मजबूत दांत ले लेते हैं। जैव-विकास के क्रम में हमारे जबड़े छोटे हुए हैं और उनमें 32 दांतों के लिए जगह नहीं बची है। इसलिए अक्सर 28 दांत ही आते हैं और कई बार तो एक के ऊपर दूसरा दांत आ जाता है।

हाल ही में एक नवजात बच्ची ने सबको आश्चर्य में डाल दिया क्योंकि 12 दिन की आयु में ही उसके निचले मसूड़े में एक दांत चमक रहा था। जन्म के समय या एक महीने के भीतर दांतों का आना एक बिरली बात है। इस प्रकार के दांतों को पैदाइशी या प्रसव दांत कहते हैं और ये 2,500 में किसी एक बच्चे में देखे जाते हैं।

पैदाइशी दांत जबडों में मजबूती से न जुड़े होने के कारण मसूड़ों में हिलते रहते हैं। दांतों के डॉक्टर ऐसे दांतों को निकाल देते हैं क्योंकि खुद निकलकर ये सांस की नली में भी जा सकते हैं। हालांकि चिकित्सा साहित्य में पैदाइशी दांत के सांस की नली में जाने का कोई उदाहरण नहीं मिलता।

इसके अलावा दर्द और अड़चन के कारण बच्चे अक्सर दूध पीना छो़ड देते हैं। मां को भी दूध पिलाने में दिक्कत हो सकती है। इंडियन जनरल ऑफ डेंटिस्ट्री में सन् 2012 में छपे एक शोध के अनुसार पैदाइशी दांतों के मामले में आनुवंशिकी की भी भूमिका होती है। अगर माता-पिता, नजदीकी रिश्तेदार या भाई-बहन में पैदाइशी दांत थे तो नवजात में इसकी संभावना 15 प्रतिशत ज्यादा होती है।

अक्सर पैदाइशी दांत पर एनेमल की मजबूत परत भी नहीं होती है और ये पीले-भूरे रंग के होते हैं। कई संस्कृतियों में पैदाइशी दांत को शगुन-अपशगुन माना जाता है। रोमन इतिहासज्ञ टाइटस लिवियस (ईसा पूर्व पहली सदी) ने इन्हें विनाशकारी घटनाओं का संकेत बताया था। दूसरी ओर, प्लिनी दी एल्डर नामक इतिहासकार ने पैदाइशी दांतों को लड़कों में शानदार भविष्य तथा लड़कियों में खराब घटना का द्योतक बताया था।

इंग्लैंड के लोग पैदाइशी दांत वाले बच्चों को मशहूर सैनिक और फ्रांस एवं इटली में ऐसे बच्चों को भाग्यशाली मानते थे। चीन, पोलैंड और अफ्रीका में ऐसे बच्चों को राक्षस एवं दुर्भाग्य का वाहक समझा जाता था। आजकल बेहतर इलाज की उपलब्धता के चलते पैदाइशी दांतों के आने पर बच्चों को तुरंत ही दांतों के डॉक्टर को दिखाना चाहिए और सावधानीपूर्वक बच्चे की जांच की जानी चाहिए। माता-पिता की जागरूकता बढ़ाने के लिए चिकित्सकीय परामर्श भी बेहद आवश्यक है।

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