मंड्या/वार्ताजिस समय राज्य की सभी प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां गंभीरता के साथ चुनावी गुणा-भाग पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, उसी समय कांग्रेस के अंदरखाने कई मसलों पर मतभेद गहराने की चर्चा चल प़डी है। किसी और को इससे कोई फायदा हो या न हो, जनता दल (एस) को निश्चित रूप से इसमें अपना फायदा नजर आने लगा है। खास तौर पर मंड्या जिले में चुनावी जीत दर्ज करने के लिए पार्टी को कांग्रेस की खेमेबाजी और अंदरूनी रार गहराने का इंतजार है। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौ़डा की अगुवाई वाली यह पार्टी इसके बल पर मंड्या जिले की सात में से कम से कम चार सीटें जीतने का सपना संजोये हुए है। पार्टी ने मंड्या महानगर निगम में अपने मौजूदा पार्षद चिक्कन्ना एम. को अपना प्रत्याशी बनाया है। लगातार दो बार पार्षद चुनाव जीत चुके चिक्कन्ना को पूरी उम्मीद है कि वह मंड्या में अपने कांग्रेस प्रतिद्वंद्वी को पटकनी देने में सफल रहेंगे। जिले की सात विधानसभा सीटों में मालवल्ली, मद्दूर, मंड्या, श्रीरंगपटना, नागमंगला, मेलकोटे और केआर पेट शामिल हैं्। माना जा रहा है कि इन सीटों पर भाजपा कोई गुल नहीं खिला सकेगी, सो यहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस और जनता दल (एस) के बीच ही होगा। उल्लेखनीय है कि मंड्या जिले को वोक्कलिगा समुदाय के मतदाताओं के बाहुल्य वाली सीट के तौर पर देखा जाता रहा है। यह पूरे राज्य में किसान आंदोलनों का केंद्र रहा है। पिछले तीन-चार वर्षों के दौरान कृषि क्षेत्र की समस्याओं ने किसानों की आत्महत्याओं के मसले ने तमिलनाडु के साथ चल रहे कावेरी जल बंटवारे के विवाद को लगातार तीखा बनाया है। सो, १२ मई को होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पूर्व सभी पार्टियां इन दोनों मुद्दों पर लगातार दावे और आरोपों का खेल खेल रही हैं्। मशहूर कन्ऩड अभिनेता और वरिष्ठ कांग्रेसी राजनेता एमएच अंबरीश ने इस वर्ष चुनाव नहीं ल़डने का निर्णय लेकर कांग्रेस के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। उनके इस निर्णय के बाद उनके समर्थक माने जाने वाले अमरावती चंद्रशेखर, पूर्व मंत्री आत्मानंद और रवि कुमार गौ़डा गणिका ने इस सीट पर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव ल़डने की इच्छा जताई थी। इन्हें टिकट आवंटित करने का निर्णय लेते वक्त पार्टी में काफी मतभेद उभरने की खबरें सामने आई थीं। वहीं, मंत्री डीके शिवकुमार का दावा है कि अब यह विवाद और मतभेद बीते समय की बात हो चुके हैं। यह सच है कि पहले पार्टी में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई थी लेकिन खुद शिवकुमार के ही हस्तक्षेप से कथित तौर पर समस्याओं का समाधान कर लिया गया है। सो, शिवकुमार दावा करते हैं कि रवि कुमार को पार्टी का टिकट देने का निर्णय एक अच्छा फैसला है क्योंकि वह युवा हैं। उन्हें टिकट दिए जाने से टिकट की हो़ड में जुटे अन्य नेताओं ने भी अपना बगावती तेवर वापस ले लिए हैं। इसके बावजूद यह सवाल बना हुआ है कि जिले में बेहद लोकप्रिय रहे अंबरीश क्या मंड्या में कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थन में चुनाव प्रचार करेंगे?ृैंद्धद्यर्‍प्रय् द्मष्ठ झ्य्ट्टर्‍श्च ·र्ैंह् ्यख्रद्भय् थ्ह्क्वय्एक कांग्रेस कार्यकर्ता सातनूरु कृष्णा का दावा है कि वह कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार अभियान में जरूर शामिल होंगे। वहीं, एक अन्य कार्यकर्ता ने गोपनीयता की शर्त पर बताया कि अंबरीश ने पार्टी नेतृत्व को चुनाव नहीं ल़डने के अपने निर्णय के बारे में अंतिम क्षणों में जानकारी दी। यह एक प्रकार का धोखा था और इससे आशंका बनी हुई है कि उनके समर्थक कांग्रेस को मंड्या में किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसी आशंका जताने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है, ’’अब सबको समझ में आ चुका है कि अंबरीश और मुख्यमंत्री सिद्दरामैया के बीच मतभेद का मुद्दा क्या था। हमें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह (अंबरीश) जिले में कांग्रेस प्रत्याशियों के लिए चुनाव प्रचार अभियान में हिस्सा लेंगे। हमें इस बात की जानकारी भी मिल चुकी है कि चुनाव ल़डने के लिए कांग्रेस से टिकट मांगने वाले प्रत्याशी चंद्रशेखर और आत्मानंद पार्टी के फैसले से अब तक नाराज हैं। सो, कांग्रेस प्रत्याशी को इस जिले में इनकी तरफ से भी कोई खास मदद मिलने की उम्मीद न के बराबर है। इन सबके बावजूद जिले में हर कांग्रेसी को चुनावी जोश से लबालब करने के लिए हर संभव कोशिश की जा रही है।’’ उल्लेखनीय है कि अंबरीश ने वर्ष २०१३ के चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वी को ४२ हजार से अधिक मतों से जोरदार शिकस्त दी थी। उस चुनाव में पूर्व मंत्री एम श्रीनिवास जनता दल (एस) के टिकट पर यहां अंबरीश के सामने ख़डे थे। वहीं, चुनाव मैदान में अंबरीश की गैर-मौजूदगी और कांग्रेस की आंतरिक उठा-पटक से जिले की सातों सीटों पर जनता दल (एस) के लिए अनुकूल हालात उत्पन्न हो सकते हैं। पार्टी के प्रत्याशी और पूर्व मंत्री श्रीनिवास की यहां के मतदाताओं पर अच्छी-खासी पक़ड बताई जाती है। खास तौर पर वोक्कलिगा वोट बैंक का एक ब़डा हिस्सा उनका समर्थक माना जाता है। वह कहते हैं, ’’पिछले चुनाव में यहां कांग्रेस की ओर से अंबरीश की मौजूदगी की वजह से हमें चुनावी नुकसान उठाना प़डा था लेकिन इस बार मद्दूर, मालवल्ली और श्रीरंगपटना में हमारी जीत की संभावनाएं काफी उज्ज्वल नजर आ रही हैं। केआर पेट, मेलकोटे, नागमंगला में भी जनता दल (एस) की जीत की संभावनाएं विश्लेषकों को अभी से नजर आने लगी हैं। यह बात अलग है कि इन सीटों पर पार्टी को अपने प्रतिद्वंद्वियों से क़डी टक्कर मिलने की भी आशंका है।’’झ्य्यट्टश्चद्भह्र ·र्ैंर्‍ ृख्रत्रय् द्धख्रध्र्‍ द्बख्द्य घ्ष्ठब्द्यष्ठ प्ब्र्‍ हालांकि भाजपा इस सीट पर काफी कमजोर है लेकिन इसने कांग्रेस और जनता दल (एस) का सिरदर्द ब़ढाने के लिए जिला पंचायत के सदस्य रहे चंदगलु एन शिवन्ना को यहां अपने प्रत्याशी के तौर पर ख़डा कर दिया है। शिवन्ना ने जनता दल (एस) द्वारा श्रीनिवास को अपना उम्मीदवार बनाए जाने के निर्णय में पार्टी से नाता तो़डकर भाजपा की शरण ले ली थी। भाजपा ने उन्हें निराश नहीं किया। वहीं, दिलचस्प बात यह है कि इस वर्ष के चुनाव मैदान में कांग्रेस ने मंड्या सीट से जनता दल (एस) के ही पूर्व विधायक एन चलुवरायस्वामी को अपने टिकट से नवाजा है। चलुवरायस्वामी ने हाल में मुख्यमंत्री सिद्दरामैया और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के अध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में मैसूरु में कांग्रेस की सदस्यता ली थी। उन्होंने वर्ष २०१३ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेता सुरेश गौ़डा को पटकनी दी थी। जब चलुवरायस्वामी ने कांग्रेस की सदस्यता हासिल की तो सुरेश गौ़डा ने कांग्रेस छो़डकर जनता दल (एस) की सदस्यता ले ली। अब नागमंगला में मुख्य मुकाबले में दिख रहे दोनों प्रत्याशियों के चेहरे पुराने हैं, जबकि दोनों बदली हुई पार्टियों से चुनाव ल़ड रहे हैं। जनता दल (एस) के नेता चिक्कन्ना का दावा है कि मंड्या में अंबरीश की कमी पूरी करने के लिए कांग्रेस ने चलुवरायस्वामी को अपना प्रत्याशी बनाया है। इस जिले में ६० प्रतिशत से अधिक आबादी वोक्कलिगा समुदाय की है। कांग्रेस ने इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए यहां चलुवरायस्वामी को अपना प्रत्याशी बनाया है क्योंकि कांग्रेस अब यहां बहुत अधिक ताकतवर पार्टी नहीं रह गई है। चिक्कन्ना का दावा है कि उनकी पार्टी मुख्यमंत्री सिद्दरामैया की अगुवाई वाली सरकार की असफलताओं के बारे में यहां की आम जनता को जागरूक करने का प्रयास कर रही है। इसके साथ ही गन्ने की खेती करने वाले अधिकांश किसानों के सामने मुंह बाए ख़डी समस्याओं के बारे में भी चर्चा की जा रही है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक ने अपनी चुनावी रैलियों में लगातार किसानों की समस्याओं और उनकी आत्महत्याओं के मामलों पर अधिक से अधिक जोर दिया है।

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