84 वर्षीय पिस्ताबाई ने रो-रोकर सुनाई अपने बेटों की दास्तान। जानकर दंग रहे जाएंगे आप। सोचने को मजबूर होंगे कि कहां जा रहा है यह समाज?

बेंगलूरु शहर के एक नामी गिरामी परिवार के 86 वर्षीय मुखिया मदनलाल गोटावत आज चलने फिरने की हालत में नहीं हैं। केयर टेकर के सहारे और अपनी 84 वर्षीय धर्मपत्नी पिस्ताबाई की देखरेख में जिंदगी का यह कठिन दौर जैसे तैसे गुजार रहे हैं। गोड़वाड़ भवन के सामने राणावत अतिथि भवन के एक कमरे में रह रहा यह दम्पत्ति सामाजिक कार्यकर्ता कुमारपाल सिसोदिया का आभार जता रहा है जिनकी तत्परता से  उन्हें यह आसरा मिला जबकि उनकी अपनी संतान ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया। 

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। गोड़वाड़ भवन के सामने राणावत अतिथि भवन के दूसरे माले पर एक कमरे में 86 वर्षीय मदनलाल गोटावत एक बिस्तर पर लेटे हुए हैं। उनके पास ही बैठी हैं उनकी 84 वर्षीय पत्नी पिस्ता बाई जो हर पल अपने बेटों के व्यवहार को कोस रही हैं। हमारे संवाददाता ने उनसे मिलने आने वाले महिला-पुरुषों का मंगलवार को तांता लगा हुआ देखा। हालांकि गोटावत परिवार किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इसी एक बड़े कुटुम्ब का हिस्सा रहे मदनलाल गोटावत के दो पुत्र गौतम और सुनील गोटावत हैं तथा पांच लड़कियां हैं जो अपने अपने ससुराल में हैं। राजस्थान के सोजत सिटी मूल के ्रेऔर बेंगलूरु में बसे मदनलाल गोटावत ने अपने जमाने में खूब धन कमाया और संतानों को पाल पोसकर बड़ा किया। उनकी धर्मपत्नी पिस्ताबाई ने ‘दक्षिण भारत’ को बताया कि वे इस वृद्धावस्था में अपने छोटे बेटे सुनील गोटावत के साथ रह रहे थे। बड़ा बेटा गौतम गोटावत संपत्ति में अपना हिस्सा लेकर अलग रह रहा है। बरसों से उसने तो हमसे नाता मानो तोड़ ही रखा है और छोटे बेटे को भी हमारे द्वारा सब कुछ देने के बावजूद उसने हमारी दयनीय हालत बना रखी है। आंखों में आंसू लिए अपनी भरभराती आवाज में पिस्ताबाई कहती हैं कि बीमार हालत में पराधीन हुए ‘इनको’ लेकर मैं कहां जाऊं? मेरी बेटियों और जंवाइयों ने भी सहयोग का हाथ बढ़ाया परन्तु बेटियों के ससुराल में जाकर रहना क्या शोभा देता है? करोड़ों रुपए जिन बेटों को मिले वे भी रखने को तैयार नहीं तो बेटियों पर बोझ हम कैसे बन सकते हैं? मेरे देवर चैनराज गोटावत ने भी सहयोग का हाथ बढ़ाया परन्तु हम अपनी जायी संतान के पास रहकर ही जिंदगी के अंतिम दिन गुजारना चाहते थे। छोटे बेटे ने हमें बहुत जलील किया, अपशब्द कहे, खाना भी नहीं देता था और कोई बेटी या रिश्तेदार कभी मिलने भी आ जाएं तो उनसे लड़ने झगड़ने लगता था। इतना ही नहीं, बैंक में हमारा जो अपना पैसा जमा है, वह हम नहीं निकाल सकें, ऐसा एक लेटर भी बैंक को दे दिया। हमें मानसिक रूप से भी प्रताड़ित किया गया। जब पानी सिर से ऊपर निकल गया तो मैंने अपनी बेटियों को बोलकर गोड़वाड़ भवन में संपर्क करने को कहा और यहां रहते हुए चार दिन हो गए। यहां कुमारपालजी ने हमें रोगियों वाला एक बिस्तर भी तुरंत मंगवाकर दिया ताकि आरामदायक रहे। यहां कोई दिक्कत नहीं है। बस दुख इसी बात का है कि अपने द्वारा जन्म दी गई संतान भी जब ऐसी निकल जाए तो बुढ़ापा बिगड़ ही जाता है, नर्क बन जाता है। पिस्ताबाई कहती हैं, हमारे मन में कितनी पीड़ा है वह कैसे व्यक्त करें बस इतना ही कह सकते हैं कि हमारी अर्थी को बेटों और इनके परिवार के किसी सदस्य का हाथ नहीं लगने चाहिएं। हम अपनी अंत्येष्टि का अधिकार अपने देवर चैनराज गोटावत को देते हैं।

आज कोई भी कठोर से कठोर हृदय वाला व्यक्ति भी इस दंपत्ति को अपनी आंखों से देख ले तो उसकी आंखें नम हुए बिना नहीं रहेंगी। व्यक्ति को यह घटना सोचने का बाध्य कर देगी कि क्या हम ऐसा समाज गढ़ रहे हैं? जिन माता पिता ने जन्म दिया, पाल पोसकर किसी लायक बनाया और अपनी कड़ी मेहनत से कमाकर करोड़ों रुपये कमाकर संतान को दिए और वही बुढ़ापे में अपने जन्मदाता को दर दर की ठोकरें खाने को छोड़ दे, क्या यही संस्कार हमने पाये हैं? लाखों, करोड़ों का दान करने वाले समाज, सामाजिक संस्थाओं में आगे बढ़ बढ़ कर अच्छी अच्छी आदर्श वाली बातें करने वाले समाज की क्या असलियत यह है? क्या यह सच्चाई नहीं है कि अब आंखों की शर्म मर चुकी है, बस पैसा ही सब कुछ हो गया है? माता-पिता से भी सब कुछ हड़प लेने या लिखवा लेने के बाद उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए भी पराधीन कर देने वाली संतानों के बारे में यह समाज क्या सोच रहा है? क्या समाज की कोई जिम्मेदारी नहीं है? इन अनेक सामाजिक संस्थाओं में भी क्या ऐसे लोग नहीं घुसे हुए हैं जो बाहर आदर्शवाद का ढकोसला करते हैं और अंदर उन्हीं के घरों में बूढ़े मां-बाप सिसकियां भर भर कर रो रहे हैं? आज जो जवान हैं और अपने बुजुर्गों के साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं, वे क्या कभी बूढ़े नहीं होंगे? जो फसल हम बो रहे हैं, क्या हमें वहीं नहीं काटनी होगी? बहुत सारे ऐसे सवाल हैं जो इस घटना ने नए सिरे से खड़े कर दिए हैं। इन सवालों का जवाब समाज के हर व्यक्ति को खोजना होगा। ऐसी घटनाओं की निंदा करनी होगी, भर्त्सना करनी होगी, धिक्कारना होगा ऐसे कृत्यों को। आत्म चिंतन करना होगा सबको कि पैसा क्या मां-बाप से भी बड़ा हो गया है?

9 COMMENTS

  1. Very sorry to know about Madanlaljisa Gotavat. I know him personally very well & he is a trustee wiyh me of Shankeswar Dham Ramnagar. I am going to meet him today & get justice from authorities. Bhagwan kisi ke saath Aisa na ho. Thanks to Dakshin Bharat & Srikantji Parashar to publish article.

  2. It’s very bad to here this it’s should not happen with anyone .. that also in this age old age is equal to small child … They should get justice for this

  3. Bahut galat hua in logon ke saath. Poore jeevan apne bacchone ke liye kaam kiya aur araam ke samay unhe hi ghar se nikalna pada.

  4. Mata pita ko apne jiteji apni property bachcho ke Naam nai krni chahiye, unke hath me sab kuch rahega to bachche apne aap seva karenge,is lalach se ki kahi maa Paa property kisi or ke Naam na krde.

  5. He can always revoke the deeds and get all the money he has given to his sons. The bank has no right to accept others letter to stop their payment. Court is already in favor of elders. I would have appreciated if the journalist has met his sons and taken their statement too. This is fair treatment to all.

  6. I know him personally. He is father in-laws of my friend. We condemn. What is learning point here is that Never give rights of property to son until death. We should make a Registered will secretly and hand over copy to 2/3 relatives, whom we trust. He will not suffer, because all his daughters r well to do.

  7. You have no idea what disgusting sons they are.
    I have personally seen them cry so many times..
    No parents deserve this.
    Talking about legal ways, their son has a lot of dirty political influence and he’s using it to destroy them.

  8. करमों ने भगवान को नहीं छोड़ा!!!
    हिम्मत राखिए!!!!!
    धन्यवाद🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

  9. Bhagwan unko sadhbudhi de aur apne Maa baat Ko Ghar Lakar unki seva Kare anthim samay thak ye veer Prabhu se Prarthna karte hai

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