हैवानियत से दफन उम्मीदें

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इस खबर ने हर भारतीय का हृदय विदीर्ण किया कि रोजी-रोटी की तलाश में इराक गए ३९ भारतीय मारे जा चुके हैं। तीन साल से सरकार उनके जीवित होने का जिस तरह भरोसा दिला रही थी, अब उनके मरने के बयान पर परिजन सहज विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। राज्यसभा में विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने बताया कि गहरे गड्ढे में दफन ३८ भारतीय श्रमिकों के डीएनए परिवार के लोगों से मैच कर गए हैं। एक अभागे का माता-पिता न होने के कारण डीएनए नहीं मिला। पंजाब के लिए यह ब़डा सदमा है क्योंकि मारे गए ३१ लोग पंजाब के थे और चार लोग हिमाचल के। शेष दो-दो बिहार व पश्चिम बंगाल के थे। भारत सरकार के आग्रह पर डीप पेनिट्रेशन रेडार के जरिये शवों का पता लगाया गया और शवों को निकाला गया। इनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे दूसरे धर्म को मानने वाले थे। निर्दयी आईएसआईएस ने इनके साथ गए ५५ बांग्लादेशियों को छो़ड दिया, जिनके साथ एक भारतीय हरजीत मसीह खुद को बांग्लादेशी बताकर बच गया था। आईएसआईएस की वहशियाना हरकतों की कीमत इन निर्दोष भारतीयों को चुकानी प़डी। नि:संदेह आतंक की चपेट में आए इन इलाकों में अराजकता का मंजर होने के कारण किसी कूटनीतिक प्रयास से अपहृत भारतीयों को बचा पाना संभव नहीं था।यह घटना कई सवालों को भी जन्म देती है। एक तो एजेंटों के माध्यम से सुनहरे भविष्य के सपनों को लेकर विदेश जाने वालों का ठीक-ठीक अनुमान लगाना सरकार के लिए कठिन होता है। यदि ये विधिवत तरीके से विदेश जाएं तो सरकार ऐसे खतरनाक इलाकों में जाने की मनाही तो कर सकती है। मामले को लेकर राजनीतिक बयान भी आ रहे हैं, मगर एक सत्य यह है कि हमारे सत्ताधीश देश में इन युवाओं को रोजगार देने में नाकाम रहे, जिसके चलते उन्हें जान जोखिम में डालकर इराक जाने को बाध्य होना प़डा। सवाल यह भी कि जो हरजीत मसीह, अली बनकर भाग निकला था, उसने तभी इन सबके मारे जाने की पुष्टि कर दी थी, उसकी बातों पर सरकार ने विश्वास क्यों नहीं किया? मोसूल को आईएसआईएस से आजाद हुए एक साल हो चुका है तो पुष्टि होने में इतनी देरी क्यों हुई? बताया जाता है कि इनका अपहरण २०१४ में हुआ था तो फिर विदेशमंत्री किस आधार पर इनके जीवित होने का दावा कर रही थीं? क्या यह हमारे खुफिया तंत्र की नाकामी है? जिन लोगों के परिजनों को आस बंधाई गई थी कि ३९ भारतीय सुरक्षित हैं, उनको अचानक मरने की खबर देना एक वज्रपात जैसा है। आखिर सूचना देने में इतना विलंब क्यों? घटना के समय व नरसंहार कैसे हुआ, इनके बारे में सरकार ने प्रामाणिक जानकारी क्यों नहीं दी? सरकार कह रही है कि ऐसा आईएसआईएस व इराक सरकार द्वारा पुष्टि न करने की वजह से हुआ।

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