हथियारों की सौदेबाजी

0
221

भारत को हथियारों की आपूर्ति के मामले में अमेरिका ने रूस को पछा़ड दिया है। रक्षा पर संसद की स्थायी समिति की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन वर्षों के दौरान अमेरिका की कंपनियों ने भारत में २८,८०० करो़ड रुपए के १३ रक्षा ठेके हासिल किए्। इस दौरान रूस को कुल ८,३०० करो़ड रुपए के १२ ठेके मिले। इस तरह रूस को मिले ठेकों की राशि अमेरिका के मुकाबले एक तिहाई भी नहीं है। भारत के रक्षा सौदों में रूस की हिस्सेदारी और भी कम हो सकती है क्योंकि अमेरिका ने रूस से हथियार खरीदने वाले देशों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है। ये प्रतिबंध काउंटरिंग अमेरिकाज एडवरसरीज थ्रू सेक्शंस ऐक्ट (सीएएटीएसए) का हिस्सा है जिसे अमेरिकी संसद ने पिछले साल पारित किया था। यह कानून रूस, ईरान और उत्तर कोरिया को ध्यान में रखकर बनाया गया है लेकिन भारत की सबसे ब़डी चिंता रूस को लेकर है। इसमें उन देशों पर प्रतिबंध लगाने की बात की गई है जो रूस के रक्षा और खुफिया संस्थानों के साथ लेनदेन में शामिल हैं्। इसमें भारत को सबसे ज्यादा खतरा है क्योंकि उसकी सेनाएं अपने साजोसामान के कलपुर्जों, रखरखाव और मरम्मत के लिए पूरी तरह रूसी खरीद पर निर्भर है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि रूस से खरीद बंद होने पर भारतीय सेना थम जाएगी। भारत रूस से नए रक्षा सौदों की संभावनाएं भी तलाश रहा है। इनमें परमाणु पनडुब्बी को पट्टों पर लेना, २०० कामोव-२२६ हेलीकॉप्टर तथा एस-४०० ट्रायंफ आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली खरीदना शामिल है। यह दिलचस्प है कि हाल के दिनों में सामरिक हलकों में फिर से यह सुगबुगाहट पैदा हुई है कि उक्त कानून के तहत भारत पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं्। ऐसी अटकलें हैं कि एस-४०० ट्रायंफ खरीदने का प्रस्ताव अमेरिका को नागवार गुजरा है। इस कानून की तरह एस-४०० खरीदने का प्रस्ताव भी नया नहीं है। रक्षा मंत्रालय ने दिसंबर २०१५ में इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी और तबसे इस पर बातचीत चल रही है। पिछले दिनों रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण की रूस यात्रा से इसमें तेजी आई। एस-४०० ट्रायंफ एस-३०० का उन्नत संस्करण है जिसका इस्तेमाल चीन की सेना कर रही है। अमेरिकी वायुसेना इसकी काट ढूंढने के लिए काफी माथापच्ची कर रही है। इस सौदे की अनुमानित लागत ४५० करो़ड डॉलर है जिसे अमेरिका नजरअंदाज नहीं कर सकता। विडंबना है कि भारत के प्रति झुकाव रखने वाली अमेरिकी कांग्रेस ने यह कानून बनाया है। वास्तव में तो भारत को जाने-अनजाने ही इसका नुकसान उठाना प़ड रहा है, असल में तो इसके निशाने पर राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप हैं। अमेरिकी कांग्रेस का हर डेमोक्रेटिक सदस्य और कुछ रिपब्लिकन सदस्य रूस के प्रति ट्रंप के नरम रवैये से नाखुश हैं्। ट्रंप को रूस के खिलाफ कार्रवाई के लिए मजबूर करने की खातिर अमेरिकी संसद ने यह कानून पारित किया लेकिन इससे सहयोगी देशों के नुकसान को ध्यान में नहीं रखा गया। ट्रंप इस कानून को वापस संसद के पास भेज सकते थे लेकिन पुतिन के साथ करीबी को देखते हुए उन्हें लगा कि अगर उन्होंने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए तो इससे चीजें और बदतर हो जाएंगी।

Facebook Comments

LEAVE A REPLY