तीन स्टॉक एक्सचेंजों ने गत शुक्रवार को संयुक्त वक्तव्य जारी करके कहा कि वे भारतीय प्रतिभूतियों के विदेशी एक्सचेंजों में मूल्यांकन और लाइसेंसिंग के समझौते को तत्काल रद्द कर रहे हैं। इससे कई तरह की चिंताएं उठ ख़डी हुई हैं। यह अपने आप में संरक्षणवाद है जो एक खास बाजार (सिंगापुर स्टॉक एक्सचेंज या एसजीएक्स) को प्रभावित करता है जहां वैश्विक निवेशक भी कारोबार करते हैं। यह केवल एक उद्योग की रक्षा करता है और वह है घरेलू प्रतिभूति उद्योग। जबकि व्यापक अर्थव्यवस्था को इससे नुकसान ही पहुंचता है क्योंकि देश में विदेशी निवेश की लागत अभी हाल में ब़ढ गई है। वित्तीय योजनाओं की प्रस्तुति (उदाहरण के लिए निफ्टी या रुपए से जु़डे डेरिवेटिव) के मामले में भारत की घटती बाजार हिस्सेदारी के चलते भारतीय वित्तीय सेवा क्षेत्र और राजकोष को कई तरह के राजस्व नुकसान का खतरा उत्पन्न हो गया है। वित्त मंत्रालय द्वारा भारतीय वित्तीय सेवा क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी क्षमता के आकलन के लिए गठित विशेषज्ञ समिति ने ऐसी कई समस्याओं का उल्लेख किया जिन्हें हल करके घटती बाजार हिस्सेदारी को थामा जा सकता है। समिति ने अनेक समस्याओं को चिह्नित किया जिनमें बेहतर वित्तीय योजनाओं के अभाव, कर अनिश्चितता और पूंजी की आवक तथा उसके निर्गम का प्रबंधन करने वाले नियामकीय ढांचे की प्रशासनिक जटिलता आदि शामिल थे। इसके आधार पर प्रतिस्पर्धी मोर्चे पर नुकसान से निपटने के लिए हानि की ज़ड पर प्रहार करने का विचार बना। इसके बाद भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी), रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय को आर्थिक सुधार लाने होंगे। इसके बजाय नीति निर्माताओं ने सिंगापुर की निफ्टी वायदा कारोबार तैयार करने की क्षमता पर प्रहार किया। इससे देश की छवि भी बिग़डती है। संरक्षणवाद का गलत उपाय अपनाने की बहुत जल्दबाजी दिख रही है जबकि वास्तविक समस्याओं की ओर ध्यान नहीं है। सरकार का यह निर्णय तब सामने आया है जब एसजीएक्स ने सिंगल स्टॉक निफ्टी वायदे की पेशकश की। यह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के कुल वायदा कारोबार की एक तिहाई से ज्यादा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक ऐसे अनुबंध का इस्तेमाल नकदी क्षेत्र में अपने जोखिम की रक्षा के लिए करते हैं। सिंगापुर जाने से उनकी लागत कम होती है क्योंकि वहां अनुबंध डॉलर में होते हैं और कर के मोर्चे पर भी लाभ मिलता है। यह प्रतिबंध जिस तरह लगाया गया है वह रोचक है। यह संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति तीन एक्सचेंजों से आई है। बहरहाल, यह समझ पाना मुश्किल है कि बंबई स्टॉक एक्सचेंज एक ऐसे उपाय पर कैसे सहमत हो सकता है जो अनिवार्य रूप से एनएसई के कारोबार और मुनाफे को विस्तार देता है? इससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि ऐसे कदम बिना उपयुक्त अधिकार और विधिक उपायों के उठाए गए।

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