राहुल गांधी के अगला कांग्रेस अध्यक्ष बनने का औपचारिक ऐलान भले ही नामांकन पत्र वापसी की अंतिम तारीख ११ दिसंबर को हो, पर चुनाव में एकमात्र उम्मीदवार होने के चलते यह तय ही है। चुनाव में राहुल के समर्थन में एक-दो नहीं, नामांकन पत्रों के ८९ सेट दाखिल किए गए, जबकि किसी और ने चुनावी औपचारिकता के लिए भी नामांकन नहीं किया। यह कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की वास्तविकता बयां करने के लिए काफी है। कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र और वंशवाद को लेकर स्वाभाविक ही भाजपा की ओर से तल्ख टिप्पणियां भी आई हैं। राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप और कटाक्ष अनपेक्षित नहीं हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में न्यूनतम मर्यादा तो रहनी ही चाहिए। औरंगजेब राज सरीखी टिप्पणियों से परहेज करना चाहिए। बेशक कई अन्य दलों में भी नेतृत्व पर वंशवाद हावी है, लेकिन इससे कांग्रेस अपनी रीति-नीति को उचित नहीं ठहरा सकती। स्वतंत्रता आंदोलन से निकली और देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने के नाते उससे उच्च आदर्श और आचरण की अपेक्षा की जाती है। अगर आजादी के बाद के सात दशकों में कांग्रेस कमजोर हुई है और अन्य राजनीतिक दल मजबूत तो इसके लिए उसे आत्मावलोकन करना चाहिए।१३२ साल पुरानी कांग्रेस की कमान राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी से संभालेंगे, जो लगभग १९ साल पार्टी अध्यक्ष रहीं। पिछले कई वर्षों से राहुल कांग्रेस उपाध्यक्ष हैं, उससे पहले महासचिव रहे। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक ही उठता है कि अध्यक्ष बनने के बाद वह ऐसा कौन-सा करिश्मा करेंगे, जो अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही कांग्रेस का पुनरुत्थान कर सके। कोई सहमत हो या असहमत, सच यही है कि वर्ष २०१४ के लोकसभा चुनावों में भाजपा को अकेले दम पर मिले बहुमत और प्रधानमंत्री पद पर नरेंद्र मोदी की ताजपोशी के बाद भारतीय राजनीति के तेवर बदल गए हैं। बेशक राजनीतिक भाषा और भाव-भंगिमा में आई आक्रामकता स्वागत योग्य नहीं कही जा सकती, लेकिन भाजपा को चुनाव-दर-चुनाव मिलती सफलता तो यही बताती है कि मतदाताओं को यह रास आ रही है। नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी की असली कसौटी पार्टी को चुनावी सफलता दिलवाना ही होगी। कमोबेश हर अध्यक्ष के साथ संगठनात्मक ढांचा बदलता है, राहुल की ताजपोशी के साथ भी बदलेगा, पर किसी भी राजनीतिक दल की असली परीक्षा चुनाव ही होते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में महज ४४ सीटों पर सिमट गयी कांग्रेस को पुन: केंद्रीय सत्ता की दावेदार बनाना राहुल गांधी की सबसे ब़डी चुनौती होगी। बेशक उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता भी यही होगी, पर मुश्किल यह है कि उनकी ताजपोशी के बाद पहले चुनाव परिणाम मोदी के गृह राज्य गुजरात से आएंगे।

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