protests in pakistan

इस्लामाबाद। पाकिस्तान के उच्चतम न्यायालय द्वारा ईसाई महिला आसिया बीबी को ईशनिंदा मामले में बेगुनाह करार दिए जाने के बाद वहां हिंसा भड़क उठी है। अब तक पूरे मुल्क में कई जगह विरोध प्रदर्शन और आगजनी की खबरें हैं। कराची, पेशावर, लाहौर, इस्लामाबाद जैसे बड़े शहरों में जनजीवन बाधित हुआ है। इस फैसले से कट्टरपंथी बुरी तरह भड़क गए हैं और आसिया को फांसी पर लटकाने की मांग कर रहे हैं। पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन और धमकियों के वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किए जा रहे हैं। इस बीच कुछ ऐसे लोगों के वीडियो भी सामने आए हैं जिन्होंने आसिया के पक्ष में फैसला देने वाले जजों की हत्या करने की हिमायत की है।

ऐसे उपद्रवी तत्वों कहना है कि आसिया के पक्ष में फैसला देने के बाद जज भी उसके गुनाह में शरीक हो गए हैं। लिहाजा इनका कत्ल कर देना वाजिब है। बुधवार को जब आसिया बीबी के मामले में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश साकिब निसार, जस्टिस आसिफ सईद खोसा और जस्टिस मज़हर आलम खान ने फैसला सुनाया तो हिंसा भड़क गई। हालांकि वहां के ईसाई समाज ने फैसले पर खुशी जताई, लेकिन उन्हें इस बात का डर है कि अब आसिया का पाकिस्तान में रह पाना मुमकिन नहीं होगा, क्योंकि कट्टरपंथी उनकी हत्या करने का मंसूबा बना चुके हैं।

मामला चूंकि ईसाई महिला से जुड़ा था तो पाकिस्तान में ऐसी चर्चा है कि यह फैसला पश्चिमी देशों के दबाव में लिया गया है। इसके लिए न केवल उच्चतम न्यायालय के जजों बल्कि सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के खिलाफ भी नफरत भरे नारे लगाए गए। कट्टरपंथियों ने कहा कि अदालत और फौज पश्चिमी ताकतों के सामने नतमस्तक हैं।

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गुरुवार को भी पाकिस्तान के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुआ। इस दौरान स्कूल और कॉलेज बंद रहे। प्रदर्शनकारियों ने रास्ते रोके, तोड़फोड़ की और नारे लगाए। एक कट्टरपंथी ने कहा कि जिस प्रकार ईशनिंदा कानून का विरोध करने पर सलमान तासीर की उनके ही अंगरक्षक ने हत्या कर दी थी, इसी प्रकार उक्त तीनों जजों की भी हत्या कर दी जाएगी। उन्होंने इसके लिए अपने समर्थकों को सार्वजनिक रूप से आदेश दिया है। हालात बिगड़ने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान सामने आए और उन्होंने लोगों से शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील की। हालांकि उनकी अपील का कोई असर नहीं हो रहा।

यूं तो पाकिस्तान में कई विचित्र कानून हैं लेकिन ईशनिंदा कानून सबसे ज्यादा विवादों में रहा है। इसे वहां के पूर्व फौजी तानाशाह जनरल जियाउल हक ने काफी सख्ती के साथ लागू किया था। वर्ष 1980 से 1986 तक इसमें कई बिंदु जोड़कर और सख्त बना दिया गया। इसके जरिए निर्दोष और अल्पसंख्यकों को फंसाने की कई घटनाएं हो चुकी हैं। पाकिस्तान में कट्टरपंथ और आतंक की जड़ में जियाउल हक के फैसलों को जिम्मेदार ठहराया जाता है।

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