easy tips for good health
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बेंगलूरु। मौसम भले ही अपने साथ कई तरह के बुखार लेकर आया हो लेकिन घबराने की जरूरत नहीं है। थोड़ी-सी सावधानी और समझ से बुखार आपके सामने लाचार हो जाएगा।

– जब हमारे शरीर पर कोई बैक्टीरिया या वायरस हमला करता है तो हमारा शरीर अपने आप ही उसे मारने की कोशिश करता है। इसी मकसद से शरीर जब अपना टेम्प्रेचर बढ़ाता है तो उसे ही बुखार कहा जाता है। जब भी शरीर का टेम्प्रेचर नॉर्मल (98.3) से बढ़ जाए तो वह बुखार माना जाएगा। आमतौर पर छोटे बच्चों को बुखार होने पर उनके हाथ-पांव तो ठंडे रहते हैं लेकिन माथा और पेट गर्म रहते हैं, इसलिए उनके पेट से उनका बुखार चेक किया जाता है।

– 98.3 डिग्री फॉरनहाइट तक हमारी बॉडी का नॉर्मल टेंप्रेचर है। तापमान इससे ज्यादा बढ़ाता है तो उसे बुखार कहा जाता है। कई बार बुखार 104-105 डिग्री फॉरनहाइट तक भी पहुंच जाता है। आमतौर पर 100 डिग्री तक बुखार में किसी दवा की जरूरत नहीं होती। हालांकि बुखार इसी रेंज में तीन-चार या ज्यादा दिन तक लगातार बना रहे या ज्यादा हो जाए तो इलाज की जरूरत होती है। इसी तरह बुखार अगर 102 डिग्री तक है और कोई खतरनाक लक्षण नहीं हैं तो मरीज की देखभाल घर पर ही कर सकते हैं। लेकिन आजकल यानी मॉनसून में एक दिन के बुखार के बाद ही फौरन डॉक्टर के पास चले जाएं चाहे बुखार कैसा भी हो।

– बुखार अगर 102 डिग्री तक है और कोई और खतरनाक लक्षण नहीं हैं तो मरीज की देखभाल घर पर ही कर सकते हैं। मरीज के शरीर पर सामान्य पानी की पट्टियां रखें। पट्टियां तब तक रखें, जब तक शरीर का तापमान कम न हो जाए। पट्टी रखने के बाद वह गरम हो जाती है इसलिए उसे सिर्फ 1 मिनट तक ही रखें। अगर माथे के साथ-साथ शरीर भी गरम है तो नॉर्मल पानी में कपड़ा भिगोकर निचोड़ें और उससे पूरे शरीर को पोंछें। बुखार है (खासकर डेंगू के सीजन में) तो एस्प्रिन बिल्कुल न लें। यह मार्केट में डिस्प्रिन, एस्प्रिन, इकोस्प्रिन आदि ब्रैंड नेम से मिलती है। ब्रूफेन, कॉम्बिफ्लेम आदि एनॉलजेसिक से भी परहेज करें क्योंकि अगर डेंगू है तो इन दवाओं से प्लेटलेटस कम हो सकती हैं और शरीर से ब्लीडिंग शुरू हो सकती है। किसी भी तरह के बुखार में सबसे सेफ पैरासिटामोल लेना है।

मलेरिया
प्लाज्मोडियम नाम के पैरासाइट से होने वाली बीमारी है मलेरिया। यह मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से होता है जो कि गंदे पानी में पनपते हैं। ये मच्छर आमतौर पर दिन छिपने के बाद काटते हैं।

वायरल
किसी भी वायरस की वजह से होने वाला बुखार वायरल होता है। वायरल होने के कई कारण हो सकते हैं जिनमें से मुख्य कारण सीवर के पानी का, पीने के पानी में मिलना (जो कि अक्सर बारिश के दिनों में हो जाता है) और इंफेक्शन वाले आदमी और उसके सपंर्क में आई चीजों को छूना।

टायफाइड
एंट्री फीवर और मियादी बुखार भी कहते हैं। यह सेल्मोनिया नाम के बैक्टीरिया से होता है, जिससे आंत में जख्म (अल्सर) हो जाता है, जो बुखार की वजह बनता है। पीने के पानी में सीवर का पानी मिलना या किसी दूसरी वजहों से पानी का दूषित होना इसके होने का सबसे बड़ा कारण है। कब होता है वैसे तो यह कभी भी हो सकता है लेकिन बरसात के मौसम में यह सबसे अधिक होता है क्योंकि ज्यादातर इसी समय सीवेज सिस्टम खराब होता है। तेज बुखार, सिर दर्द, शरीर दर्द, उलटी, जी मितलाना। यह बुखार ज्यादातर बिना कंपकंपी के आता है।

डेंगू
डेंगू मादा एडीज इजिप्टी मच्छर के काटने से होता है। इन मच्छरों के शरीर पर चीते जैसी धारियां होती हैं। ये मच्छर दिन में, खासकर सुबह काटते हैं। डेंगू बरसात के मौसम और उसके फौरन बाद के महीनों यानी, जुलाई से अक्टूबर में सबसे अधिक फैलता है क्योंकि इस मौसम में मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां होती है। डेंगू बुखार से पीड़ित मरीज के खून में डेंगू वायरस बहुत ज्यादा मात्रा में होता है। जब कोई एडीज मच्छर डेंगू के किसी मरीज को काटता है तो वह उस मरीज का खून चूसता है। खून के साथ डेंगू वायरस भी मच्छर के शरीर में चला जाता है। जब डेंगू वायरस वाला वह मच्छर किसी और इंसान को काटता है तो उससे वह वायरस उस इंसान के शरीर में पहुंच जाता है, जिससे वह डेंगू वायरस से इन्फेटेड हो जाता है।

बच्चों का रखें खास ख्याल
बच्चे नाजुक होते हैं और उनका इम्यून सिस्टम कमजोर होता है इसलिए बीमारी उन्हें जल्दी जक़ड लेती है। ऐसे में उनकी बीमारी को नजरअंदाज न करें।

– खुले में ज्यादा रहते हैं इसलिए इन्फेक्शन होने और मच्छरों से काटे जाने का खतरा उनमें ज्यादा होता है।

– बच्चों घर से बाहर पूरे कपड़े पहनाकर भेजें। मच्छरों के मौसम में बच्चों को निकर व टी-शर्ट न पहनाएं।

– रात में मच्छर भगाने की क्रीम लगाएं। अगर बच्चा बहुत ज्यादा रो रहा हो, लगातार सोए जा रहा हो, बेचैन हो, उसे तेज बुखार हो, शरीर पर रैशेज हों, उलटी हो या इनमें से कोई भी लक्षण हो तो फौरन डॉक्टर को दिखाएं।

– आमतौर पर छोटे बच्चों को बुखार होने पर उनके हाथ-पांव तो ठंडे रहते हैं लेकिन माथा और पेट गर्म रहते हैं, इसलिए उनके पेट को छूकर और रेक्टल टेम्प्रेचर लेकर उनका बुखार चेक किया जाता है। अगर बगल से तापमान लेना ही है तो जो रीडिंग आए, उसमें 1 डिग्री जोड़ दें। उसे ही सही रीडिंग माना जाएगा।

– बच्चे को डेंगू हो तो उसे अस्पताल में रखकर ही इलाज कराना चाहिए क्योंकि बच्चों में प्लेटलेट्स जल्दी गिरते हैं और उनमें डीहाइड्रेशन (पानी की कमी) भी जल्दी होता है।

– अगर बच्चे की उम्र 6 महीने से कम है, या उसमें बुखार के दूसरे लक्षण दिखाई दे रहे हैं, या उसे दो दिन से ज्यादा बुखार है, या फिर उसका वैक्सीनेशन नहीं हुआ है तो ही डॉक्टर को बुलाएं।

– बच्चे को बुखार में आइबुप्रोफेन या फिर एसिटामिनोफेन दी जा सकती है। बाल रोग विशेषज्ञ बच्चों को एस्पीरिन न देने की सलाह देते हैं। उनके अनुसार इससे बच्चों के शरीर में रेज़ सिंड्रोम होने की आशंका होती है। यह एक तरह की गंभीर बीमारी है जो बच्चे को लीवर और दिमाग पर असर डालती है। इस बीमारी को इग्नोर करना खतरनाक हो सकता है।

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