kachnar flower
kachnar flower

बेंगलूरु। आयुर्वेद के ग्रंथों में कचनार का वर्णन बतौर ‘कचनार’ मिलता है। इस पेड़ को रोपने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह प्राकृतिक रूप से उग जाता है। इस पेड़ पर रंग-बिरंगे फूल होते हैं, जो पेड़ का सौंदर्य बढ़ा देते हैं। कचनार के पेड़ पर मई-जून में फल बड़ी मात्रा में लगते हैं।

इस फल के फूल फरवरी-मार्च में आ जाते हैं। औषधि के रूप में इसके फल (अथवा सब्जी) का प्रयोग सरल तथा सस्ता रहता है। इस पेड़ की छाल, जड़ तथा पुष्प सभी उपचार में काम आते हैं।

* चर्म रोग हो जाने पर इस पेड़ की जड़ से बने चूर्ण का सेवन किया जाता है। दिन में दो बार एक-एक चम्मच। रक्त पित्त हो जाने पर इस पेड़ के फूलों से इलाज किया जाता है।

* कृमि हटाने के लिए इसकी छाल से बना काढ़ा पिलाएं। कुष्ठ रोग में कचनार पेड़ की छाल का काढ़ा पीने को दें। चूर्ण खिलाएं। छाल डाल कर उबाले गए पानी से प्रभावी अंग धोने को भी कहा जाता है।

* यदि गंडमाला का रोग हो जाए तो कचनार पेड़ की जड़ तथा छाल का चूर्ण, सौंठ के साथ सेवन किया जाना चाहिए, अवश्य लाभ होता है। समय लग सकता है।

* व्रण रोग का भी यह इलाज है। कचनार की जड़ तथा छाल का चूर्ण बना कर रखें। इसे कभी-कभी लेते रहें। स्वस्थ व्यक्ति भी ले सकते हैं। कचनार के फूलों की सब्जी पौष्टिक होती है। इसका औषधीय प्रयोग किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की देखरेख में ही करें।

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