नई दिल्ली। वित्त मंत्री अरूण जेटली गुरुवार को संसद में वर्ष २०१८-१९ का आम बजट पेश करेंगे जो उनकी सरकार का पांचवां और संभवत: सबसे कठिन बजट होगा। इस बजट में जेटली को राजकोषीय लक्ष्यों को साधने के साथ कृषि क्षेत्र के संकट, रोजगार सृजन व आर्थिक वृद्धि को गति देने की चुनौतियों का हल ढूंढना होगा। बजट में नई ग्रामीण योजनाएं आ सकती हैं तो मनरेगा, ग्रामीण आवास, सिंचाई परियोजनाओं व फसल बीमा जैसे मौजूदा कार्यक्रमों के लिए आवंटन में ब़ढोतरी भी देखने को मिल सकती है। गुजरात में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में देखने को मिला कि भाजपा का ग्रामीण वोट बैंक छिटक रहा है जिसे ध्यान में रखते हुए जेटली अपने बजट में कृषि क्षेत्र के लिए कुछ प्रोत्साहन भी ला सकते हैं। इसी तरह लघु उद्योगों के लिए भी रियायतें आ सकती हैं क्योंकि इस खंड को भाजपा के प्रमुख समर्थक के रूप में देखा जा सकता है। जेटली माल व सेवा कर (जीएसटी) के कार्यान्वयन से इस वर्ग को हुई दिक्कतों को दूर करने के लिए कुछ कदमों की घोषणा कर सकते हैं। इसके साथ ही आयकर छूट सीमा ब़ढाकर आम आदमी को कुछ राहत देने का प्रयास भी बजट में किया जा सकता है। ऐसी अपेक्षा है। राजमार्ग जैसी ढांचागत परियोजनाओं के साथ साथ रेलवे के आधुनिकीकरण के लिए अधिक आवंटन किया जा सकता है लेकिन इसके साथ ही जेटली के समक्ष बजट घाटे को कम करने की राह पर बने रहने की कठिन चुनौती भी है। अगर भारत इस डगर से चूकता है तो वैश्विक निवेशकों व रेटिंग एजेंसियों की निगाह में भारत की साख जोखिम में आ सकती है। जेटली ने राजकोषीय घाटे को मौजूदा वित्त वर्ष में घटाकर जीडीपी के ३.२ प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखा था। आगामी वित्त वर्ष २०१८-१९ में घटाकर तीन प्रतिशत किया जाना है। ऐसी चर्चा है कि शेयरों में निवेश से होने वाले पूंजीगत लाभ पर कर छूट समाप्त हो सकती है। यह भी देखना होगा कि क्या जेटली कॉर्पोरेट कर में कमी लाने के अपने वादे को पूरा करते हैं या नहीं। जानकारों का कहना है कि कुछ क्षेत्रों में निर्यात ब़ढाने के लिए प्रोत्साहनों की घोषणा हो सकती है तो उद्यमशीलता को ब़ढावा देने के लिए स्टार्टअप यानी नई कंपनियों के लिए कुछ कदम उठाए जा सकते हैं।

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