अवधेश कुमार

यह आजाद भारत के इतिहास का पहला अवसर है जब किसी विधानसभा के एक साथ २० विधायकों की सदस्यता लाभ के दोहरे पद के कारण चली गई हो। हालांकि चुनाव आयोग ऐसा ही फैसला करेगा इसे लेकर पूरे प्रकरण की जानकारी रखने वाले किसी भी तटस्थ व्यक्ति को शायद ही कोई संदेह रहा हो। आम आदमी पार्टी आज जो भी तर्क दे, उसके नेताओं को अगर इसका आभास नहीं था तो फिर मानना चाहिए कि वो अपने द्वारा निर्मित किसी ख्वाब की दुनिया में रह रहे थे। जिस ़ढंग से दिल्ली उच्च न्यायालय ने ८ सितंबर २०१६ को २१ विधायकों के संसदीय सचिव की नियुक्ति को रद्द कर दिया था तथा जो टिप्पणियां की थीं उन्हीं से साफ हो रहा था कि इन विधायकों की सदस्यता कभी भी जा सकती है। उस फैसले से इतना तो स्पष्ट था कि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरह २१ विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया था वह संवैधानिक नहीं था। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि नियमों को ताक पर रख कर ये नियुक्तियां की गईं थीं। एक विधायक जरनैल सिंह ने इस्तीफा देकर पंजाब विधानसभा का चुनाव नहीं ल़डा होता तो उनकी भी सदस्यता चली जाती। किसी मुख्यमंत्री को संसदीय सचिव नियुक्त करने का आधिकार है और होना भी चाहिए लेकिन जो भी होगा वह संवैधानिक प्रावधानों के अनुरुप ही होगा। केजरीवाल ने यहां प्रावधानों की अनदेखी करके नियुक्ति की थी और आज उसी का परिणाम उनके विधायकों एवं स्वयं उन्हें ऐसा परिणाम भुगतना प़डा है। यह तो संयोग कहिए कि उनको ७० सदस्यों की विधानसभा में ६६ सीटें हासिल थीं जिनमें से २० के चले जाने के बावजूद बहुमत कायम रहता है, अन्यथा यदि विधायकों की संख्या कम होती तो सरकार भी जा सकती थी।

संविधान का अनुच्छेद १०२ (१) (ए) स्पष्ट करता है कि सांसद या विधायक ऐसा कोई दूसरा पद धारण नहीं कर सकता जिसमें अलग से वेतन, भत्ता या अन्य कोई लाभ मिलते हों। लाभ के पद की व्याख्या पर काफी बहस हो चुकी है। इसलिए इस मामले में बहुत ज्यादा किंतु परंतु की गुंजाइश नहीं है। इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद १९१ (१)(ए) और जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा ९ (ए) के अनुसार भी लाभ के पद में सांसदों-विधायकों को अन्य पद लेने का निषेध है। इन सब प्रावधानों का मूल स्वर एक ही है, आप यदि सांसद या विधायक हैं तो किसी दूसरे लाभ के पद पर नहीं रह सकते या यदि आप किसी लाभ के पद पर हैं तो सांसद या विधायक नहीं हो सकते। आम आदमी पार्टी तर्क दे रही है कि जिन विधायकों को संसदीय सचिव बनाया गया उनको न कोई बंगला मिला, न गा़डी, न अन्य सुविधाएं। यानी जब उन्होंने कोई लाभ लिया ही नहीं तो फिर उनको दोहरे लाभ के पद के तहत सजा कैसे दी जा सकती है? पहली नजर में यह तर्क सही भी लगता है। तो फिर चुनाव आयोग ने यह फैसला क्यों किया? चुनाव आयोग को पता है कि अगर बिना किसी ठोस आधार के फैसला करेगा तो वह राष्ट्रपति के यहां रुक जाएगा या फिर न्यायालय द्वारा वह निरस्त हो जाएगा। चुनाव आयोग ने इतना लंबा समय लिया है तो जाहिर है कि उसने इस पर पूरा विमर्श किया और फिर आश्वस्त हो जाने के बाद ही सदस्यता रद्द करने की सिफारिश कर दी।

भारत में ऐसे कई राज्य हैं जहां संसदीय सचिव का पद लाभ के पद के दायरे के अंदर आता है तो कुछ राज्य ऐसे हैं जहां यह बाहर है। दिल्ली में इन्हें लाभ के पद के दायरे में रखा गया है। दिल्ली में वर्ष १९९७ में सिर्फ दो पद (महिला आयोग और खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष) ही लाभ के पद से बाहर थे। वर्ष २००६ में नौ पद इस श्रेणी में रखे गए। पहली बार मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव पद को भी शामिल किया गया था। इसके अनुसार भी दिल्ली में मुख्यमंत्री केवल एक संसदीय सचिव रख सकते हैं। साफ है कि केजरीवाल ने २१ विधायकों की नियुक्ति करते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा। मई, २०१२ में पश्चिम बंगाल सरकार ने भी संसदीय सचिव की नियुक्ति को लेकर विधेयक पास किया था। इसके बाद ममता बनर्जी ने २० से ज्यादा विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया। बावजूद इसके कोलकता उच्च न्यायालय ने सरकार के विधेयक को असंवैधानिक ठहरा दिया तो केजरीवाल ने इस उदाहरण का भी ध्यान नहीं रखा। इसे ठीक से समझने के लिए जरा पूरे प्रसंग को संक्षेप में रखना जरुरी है। १३ मार्च २०१५ को केजरीवाल सरकार ने अपने २१ विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया था। इसके खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा की ओर से वकील रविन्द्र कुमार ने याचिका दायर की थी। उन्होंने इस नियुक्ति की संवैधानिकता पर सवाल उठाया था। इसके समानांतर दिल्ली के एक वकील प्रशांत पटेल ने १९ जून २०१५ को राष्ट्रपति के पास याचिका दायर की थी। इसमें संसदीय सचिव को लाभ का पद का मामला बताया था। पटेल ने इन २१ विधायकों की सदस्यता रद्द करने की मांग की थी। जब विवाद ब़ढा तो दिल्ली सरकार २३ जून, २०१५ को विधानसभा में लाभ का पद संशोधन विधेयक लाई। इस विधेयक का मकसद संसदीय सचिव के पद को लाभ के पद से छूट दिलाना था। विधेयक पास करा कर २४ जून २०१५ को इसे उप राज्यपाल नजीब जंग के पास भेज दिया गया। उप राज्यपाल ने इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग से सलाह मांगी। चुनाव आयोग ने याचिका दायर करने वाले से जवाब मांगा। प्रशांत पटेल ने १०० पृष्ठ का जवाब दिया और बताया कि मेरे याचिका लगाए जाने के बाद असंवैधानिक तरीके से विधेयक लाया गया। चुनाव आयोग इस जवाब से संतुष्ट हुआ और उसके अनुसार राष्ट्रपति को सलाह दी। राष्ट्रपति ने विधेयक वापस कर दिया। तो यह है पूरी कथा जिससे सब कुछ साफ हो जाता है। वैसे भी दिल्ली विधानसभा में कोई विधेयक पेश करने के पूर्व उप राज्यपाल से अनुमति का प्रावधान है। इस मामले में उप राज्यपाल से अनुमति भी नहीं ली गई थी।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 8 सितंबर 2016 को 21 विधायकों के संसदीय सचिव की नियुक्ति को रद्द कर दिया था तथा जो टिप्पणियां की थीं उन्हीं से साफ हो रहा था कि इन विधायकों की सदस्यता कभी भी जा सकती है। उस फैसले से इतना तो स्पष्ट था कि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरह 21 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया था वह संवैधानिक नहीं था।

आप स्वयं विचार करिए, केजरीवाल सरकार अगर संसदीय सचिव के पद को लाभ का पद मानती ही नहीं थी तो फिर यह विधेयक लाने की आवश्यकता क्यों महसूस की गई? उनको पता था कि गलती हो चुकी है इसलिए सुधार के लिए विधेयक पारित कर दो ताकि संसदीय सचिव का पद लाभ के पद के दायरे से बाहर हो जाए। हम यहां इस पच़डे में नहीं प़डना चाहते कि इन विधायकों ने कोई सुविधा ली या नहीं? विरोधी कहते हैंं कि ली और आम आदमी पार्टी कहती है कि नहीं ली। किंतु यह पद लाभ के पद में दायरे मेें आता है। आज वे संसदीय सचिव नहीं हैैं लेकिन जैसा चुनाव आयोग ने कहा है कि इन विधायकों के पास १३ मार्च २०१५ से ८ सितंबर २०१६ के बीच संसदीय सचिव का पद था। वर्ष २००६ में जया बच्चन मामले में उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि किसी पद से लाभ अर्जित नहीं करना, उस पद को लाभ के पद के दायरे से बाहर नहीं करता है। वे तब उत्तर प्रदेश फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष थीं। उन्हें सांसदी गंवानी प़डी। इस फैसले का मतलब यही था कि यदि आपने लाभ का पद लिया है तो आपको सांसदी या विधायकी से हटना होगा भले ही आपने वेतन या भत्ता न लिया हो। आम आदमी पार्टी का यह कहना भी गलत है कि विधायकों को अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया गया। चुनाव आयोग ने आप विधायकों से ११ अप्रैल २०१६ तक नोटिस का जवाब मांगा था। इसके बाद आप विधायकों ने ६ हफ्ते का समय और मांगा था। विधायकों ने अपना जवाब भी प्रस्तुत किया जिसमें कहा गया था कि वे संसदीय सचिव होने के नाते दिल्ली सरकार से कोई वेतन, भत्ता या ऐसी कोई दूसरी सुविधा नहीं ले रहे जो लाभ के पद के दायरे में आए। तो इस मामले की यही स्वाभाविक परिणति है। आप विधायकों का पद जाना ही था। इसे एक विडम्बना ही कहेंगे एक ऐसी पार्टी, जो राजनीति में नए मापदंड स्थापित करने के लिए आई थी, उसका हस्र ऐसा हो गया कि विधायकों को अपने नेता के पक्ष में बनाए रखने के लिए थोक भाव में संसदीय सचिव बनाने प़डे। इतने ब़डे बहुमत के बावजूद केजरीवाल को यह उम्मीद नहीं थी कि उनके विधायक स्थायी रुप से उनके नेतृत्व के प्रति निष्ठावान रहेंगे, इसलिए उन्होंने यह कदम उठाया अन्यथा इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी।

LEAVE A REPLY