maha shatavdhan by balmuni ji
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बेंगलूरु/दक्षिण भारत। शहर के अक्कीपेट स्थित वासुपूज्य स्वामी जैन संघ में चातुर्मासार्थ विराजित आचार्यश्री नयचंद्रसागरसूरीश्वरजी एवं महाशतावधानी मुनिश्री अजीतचंद्रसागरजी म.सा की प्रेरणा में महाशतावधान आयोजक समिति और अक्कीपेट संघ के तत्वावधान में ‘महाशतावधान महोत्सव’ का आयोजन आज सुबह 9 बजे से पैलेस ग्राउंड में किया जा रहा है।

इस कार्यक्रम को लेकर बेंगलूरु समाज में विशेष कौतूहल है। इस बार इस आयोजन में बालमुनि श्री पद्मप्रभचंद्रसागर द्वारा रविवार को 200 प्रश्नों के उत्तर दिए जाएंगे। आयोजन समिति के चेयरमैन पारस भंडारी व अक्कीपेट संघ के तत्वावधान में कार्यक्रम की सभी तैयारियां पूर्ण कर ली गई हैं। विभिन्न समिति के पदाधिकारी इस कार्यक्रम को सफल बनाने में व्यवस्थाओं में जुटे हुए हैं।

कृतघ्नी नहीं, कृतज्ञ बनें
स्थानीय जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में वीवी पुरम स्थित महावीर धर्मशाला में चातुर्मासार्थ विराजित श्री जयधुरंधरमुनिजी ने शनिवार को श्रावक के 19वें गुण कृतज्ञता का वर्णन करते हुए कहा कि हर जीव का परस्पर एक दूसरे पर उपकार रहता है, इसलिए जैन चिह्न के नीचे परस्परोपग्रहो जीवानाम् सूत्र अंकित रहता है।

उन्होंने कहा, परस्पर सहयोग के बगैर जीवन नहीं चल सकता। व्यक्ति दूसरों से सहयोग लेने के लिए तत्पर रहता है परन्तु जरूरत पड़ने पर अपने उपकारियों को सहयोग प्रदान करने में आगे नहीं आता। व्यक्ति को उपकारियों के उपकारों को न भूलते हुए कृतज्ञ बनना चाहिए।

उन्होंने कहा, एक आदर्श श्रावक कृतघ्नी नहीं कृतज्ञ होता है। मुनिश्री ने फलदार पेड़ का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार पेड़ पर पत्थर मारे जाने पर भी पेड़ हमें फल ही देता है, उसी प्रकार मनुष्यों को अपकारी के प्रति भी उपकार का भाव रखना चाहिए। सभा में अनेक तपस्वियों ने तपस्या के प्रत्याखान लिए।

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