बेंगलूर्रुउस दिन मैं तैयार होकर घर से कार्यालय के लिए निकल ही रहा था कि एक महाशय ने घर की घंटी बजाई। कुछ जाना पहचाना सा चेहरा था परन्तु ठीक से कुछ याद नहीं आया तो पूछना ही प़डा-‘कहिए’’। वे घर के अंदर प्रवेश करते हुए खुद ही आगे आगे हो गए ड्राइंग रुम में यह कहते हुए चले आये कि ‘चाय का नहीं पूछेंगे क्या?’’ मैंने चाय भी पिलाई, बिस्किट भी खिलाये और आधा घंटा तक उनका प्रवचन भी सुना। दरअसल वे मुझे मानद डॉक्टरेट की उपाधि बेचने आये थे। मैंने उनसे कहा भी कि आपने गलत दरवाजा खटखटा दिया है। मैंने तो युवावस्था में ही समझ लिया था कि यह डॉक्टरेट अपने वश की बात नहीं है। हालांकि मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं। मैंने खूब हाथ पांव मारे परन्तु मेडिकल में सीट के लायक नंबर नहीं ला सका। जुगा़ड करना आता नहीं था सो मैंने तो तभी तय कर लिया था कि मेडिकल वाले डॉक्टर तो छो़डो, अपने को तो पीएचडी भी नहीं करनी है। पीएचडी करने से भी तो बनना डॉक्टर ही प़डेगा और अपन जिद्दी आदमी हैं। एक बार सोच लिया कि डॉक्टर बनना नहीं है तो फिर किसी की क्या मजाल कि अपने को डॉक्टर बना दे।मेरे एक मित्र थे डॉ. सरगुकृष्ण मूर्ति। उम्र में तो मुझसे ब़डे थे परन्तु उनकी खुशमिजाजी के कारण वे मेरे मित्र बन गये। बेंगलूरु विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष थे। खूब मजाकिया इंसान थे। एक बार एक कार्यक्रम में हम दोनों अतिथि थे। उन्होंने अपने संबोधन में बार बार मेरे नाम के साथ डॉक्टर शब्द लगा लगाकर मेरी खूब सराहना की। वे सराहना कर रहे थे और इधर मैं घबरा रहा था। शुरू में मुझे लगा कि वे मजाक कर रहे होंगे परन्तु उनके गंभीर चेहरे को देखकर बाद में लगा कि उन्हें शायद कोई गलतफहमी हुई है परन्तु मेरी शान में जो भी विशेषण लगा रहे हैं भविष्य में उससे मेरी मजाक तो उ़डने ही वाली है। मेरा जब बोलने का नंबर आया तो मैंने श्रोताओं के सामने साफ साफ कह दिया कि न तो अपन डॉक्टर हैं न कभी बनने वाले हैं। इस तरह अपनी स्थिति स्पष्ट की। अपने को झूठ बोलने में बहुत डर लगता है। क्योंकि एक झूठ बोलो तो सौ झूठ बोलने प़डते हैं और याद भी बहुत रखना प़डता है कि किसको क्या बोला था। हिसाब किताब में मैं तो वैसे ही कमजोर हूं। इसलिए जीवन का फलसफा बना लिया कि साफ कहना, सुखी रहना। अपनी साफगोई में टैंशन हो भी तो सामने वाले को। अपने तो मस्त। और डॉक्टरी में तो बहुत टैंशन है। जो ब़डे ब़डे मेडिकल डॉक्टर हैं वे तो मुझे हमेशा तनाव में दिखते हैं। जो पीएचडी हैं वे भी पीएचडी करने के दौरान इस तनाव में रहते हैं कि कोई थिसिस का आइडिया या मैटर न चुराले। प्रोजेक्ट भी चुपके चुपके पूरा करते हैं। ‘धीरे धीरे बोल कोई सुन न ले’’ की तर्ज पर कई साल चेहरे से हंसी गायब रहती है। उन दिनों ये दो ही प्रकार के डॉक्टर होते थे। फिर चर्चा में आई मानद डॉक्टरेट। कभी कभार कई वर्षों में कोई एक विश्वविद्यालय किसी महान हस्ती को मानद डॉक्टरेट की उपाधि देता था। उस व्यक्ति की शख्सियत की तुलना में वह डॉक्टरेट उपाधि खुद बौनी लगती थी जबकि आजकल ऐसी डॉक्टरेट उपाधियां आ गई हैं जिनको पाकर बौना व्यक्ति भी शख्सियत बनने का ख्वाब देखने लगता है। आजकल जो नकली मानद डॉक्टरेट की उपाधियां चर्चा में हैं। वे वास्तव में वैसी मानद उपाधियां नहीं हैं जो प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों द्वारा किसी शख्स की सेवाओं और उपलब्धियों को देखकर दी जाती थीं। ‘मानद’’ यानी मान सम्मान से अलंकृत की जाने वाली डिग्री जिसे अंग्रेजी में ऑनरेरी कहा जाता है। ऐसा अलंकरण जो किसी सम्मानित व्यक्ति को देकर उसके सम्मान को समाज में अनुकरणीय उदाहरण के रूप में पेश करने का प्रयास होता था। इसलिये कोई चलता फिरता विश्वविद्यालय मानद डॉक्टरेट नहीं देता था। अब तो ऐसे ऐसे विश्वविद्यालय हैं जो कागजों में हैं या फिर गुमनामी में हैं। जिनकी खुद की ही कोई मान्यता नहीं है वे मानद उपाधियां बांटने लगे हैं। जिनका समाज में कोई खास मान सम्मान या पहचान नहीं है वे इन नकली टुच्चे ‘मानद’’ सम्मानों की चाह में पंक्ति में ख़डे दिखाई देते हैं ताकि लोग भी इनको मानें, इनको मान सम्मान मिले। वे समझते हैं कि ऑनरेरी डिग्री लेंगे तो समाज में ऑनर मिलेगा। भले ही खुद ऑनरेरी को ऑनरी ही बोल पाते हों।मुझे जो श्रीमान डिग्री बेचने आए थे उनसे मैंने विनम्रतापूर्वक पूछा कि आपको मुझ में क्या खासियतें दिखीं कि आप इतनी दूर तक तशरीफ लाये? उनको मैंने यह भी कह दिया कि अपन दो टूक साफ बात करने वाले व्यक्ति हैं, आप भी बिना लाग लपेट सब कुछ उगल देंगे तो मजा आयेगा। लगता है थो़डा तो मेरे स्वभाव के बारे में वे सर्वे करके आए थे और बची खुची जानकारी मुझसे बातचीत में उनको मिल गई जब मैंने ये वाले सारे विचार उनको सुना दिये जो मैंने ऊपर व्यक्त किये हैं। वे थो़डे सहम तो गये परन्तु उन्होंने लंबी सांस ली और अपने आपको सहज किया। उन्होंने कहा, ‘‘मान्यवर, सबसे पहली बात तो यह है कि हम जो मानद डिग्री देते हैं उसके पीछे खर्चा होता है इसलिए खाते-पीते घर का व्यक्ति ही अफोर्ड कर सकता है। आपकी शक्ल-सूरत से मुझे लगा आप अफोर्ड कर सकते हैं। आप मुझे बुद्धिजीवी भी दिखाई दिए तो लगा कि आपके नाम के साथ तो डॉक्टर लगना ही चाहिए। आजकल तो थो़डी बहुत तुकबंदी कर लेने वाले, काव्य गोष्ठियों में अपने मित्रों से वाह वाही पाने वाले और समाज में एक पहचान बनाने की चाह रखने वाले ही ऐसी अभिलाषा रखते हैं कि उनके नाम के साथ डॉक्टर लग जाए तो सोने में सुहागा हो जाए। मैंने सोचा आप साहित्यकारों की संस्था के अध्यक्ष हैं तो आपको तो डॉक्टर होना बहुत जरूरी है। आप डॉक्टर होंगे तो आपके दूसरे साथी भी डॉक्टर बनना चाहेंगे। हमारा भी ठीक ठाक गुजारा हो जाएगा। क्लाइंट ज्यादा होंगे तो भाव भी होलसेल के लगा देंगे। डिस्काउंट भी अच्छा खासा दे देंगे। तीसरी बात, मैंने सोचा कि ऐसी डिग्री पाने की खुजली काफी लोगों को होती है परन्तु पता तो तभी चलेगा न जब बातचीत करेंगे। मैंने सोचा कि आपसे बात क्यों न की जाए? अब लगता है कि हमसे गलती हुई है तो माफी मांग लेते हैं।’’’’अब मुझे उन श्रीमान पर दया आने लगी। गुस्सा तो आ रहा था परन्तु काबू में किया। मुझे लगा कि यह व्यक्ति माहौल का मारा है। बाजार में अपना प्रोडक्ट बेचने का प्रयास कर रहा है तो गलत भी क्या है? गलत तो वे लोग हैं जो नकली माल खरीद रहे हैं। भांडाफो़ड तो उनका होना चाहिए। जैसे झोला छाप डॉक्टर सोसाइटी के लिए खतरनाक हैं वैसे ही ये नकली मानद डिग्री वाले डॉक्टर भी समाज की भावी समस्या हैं। समय रहते ऑपरेशन जरूरी है नहीं तो गंभीर बीमारी का रूप ले सकती है।

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